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मंगलवार, 26 मई 2015

मन की खिड़की

मन की खिड़की
बंद खिड़की से
ना उजाला आता
ना हवा आती
अध खुली खिड़की से
हवा भी कम आती
उजाला भी कम आता
कमरे में घुटन
और अँधेरा हो जाता
खुली खिड़की से
हवा भी पूरी आती
उजाला भी पूरा आता
मन की खिड़की
हृदय के कपाट खुले हो
मन विकार रहित
जीवन सुलभ हो जाता 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
अँधेरा,उजाला,मन,हृदय,जीवन,

44-26-05-2015

तेरी ज़िंदगी में मेरा कोई ज़िक्र नहीं है

तेरी ज़िंदगी में मेरा कोई ज़िक्र नहीं है
तेरी ज़िंदगी में
मेरा कोई ज़िक्र नहीं है
मगर मेरी ज़िंदगी के
हर पन्ने की हर इबारत
तेरे ज़िक्र से भरी हुई है
हर ख्याल में
तेरी सूरत सजी है
ये बदकिस्मती ही है
मेरी ज़िंदगी अधूरी है
हसरतों को खुदा की
मंज़ूरी नहीं है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
नज़्म,शायरी,मोहब्बत,हसरत,

43-26-05-2015

अहम का कोहरा

अहम का कोहरा
कुछ लोग
अपने आप से घिरे हैं
अहम के कोहरे से
ढके हैं
मोहब्बत से परे हैं
भ्रम में जी रहे हैं
आइना देखने की
फुर्सत नहीं
आइना दिखाने में
लगे हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
अहम, जीवन

42-26-05-2015

कहने को बातें बहुत हैं

कहने को बातें बहुत हैं
कहने को बातें बहुत हैं
कहूँ जितना ही कम हैं
मौसम से प्रारम्भ होगी
देश विदेश,राजनीति 
टीवी सिनेमा से होते हुए
घर परिवार में पहुँच जाएंगी
रास्ता भटक कर
लोगों पर अटक जायेगी
मन की कुंठा बाहर आएगी
किसी की प्रशंसा
किसी की बुराई होगी
जुबां गन्दी हो जायेगी
सोच पर प्रश्न खड़ा करेगी
क्यों ना कम कह कर
कम चलाऊं
जितनी आवश्यक
उतनी बात करूँ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
बातें,कहना,जीवन

41-26-05-2015

सोमवार, 25 मई 2015

शब्दों का खेल

शब्दों का खेल
ना किसी
कविता में दर्द होता है
ना कोई गीत
दुःख से भरा होता है
ना प्यार मोहब्बत
किसी ग़ज़ल में होता है
ना ही किसी नज़्म में
जुदाई बेवफाई होती
सब शब्दों का खेल है
मन संवेदनशील
भावनाओं से युक्त ना हो
मानवता का सोच न हो
कविता हो या ग़ज़ल
सब इकसार लगते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
कविता,ग़ज़ल,नज़्म,गीत

40-25-05-2015

"मैं "बस गया हृदय में

"मैं "बस गया हृदय में
दूसरों में अवगुण ढूंढना
स्वयं के अवगुण छुपाना
मानवता की बात करना
अमानवीय काम करना
धर्म हो गया इंसान का
धन संचय अहम स्वार्थ
ईर्ष्या द्वेष होड़ में जीना
लक्ष्य हो गया इंसान का
"मैं "बस गया मन में
समाहित हो गया हृदय में
अब नहीं रहा इंसान
जैसा चाहा था भगवान ने

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
भगवान,अहम,स्वार्थ,होड़,जीवन
39-25-05-2015

सूरज तुम चमकना छोड़ दो गुलाब तुम महकना छोड़ दो

सूरज तुम चमकना छोड़ दो
गुलाब तुम महकना छोड़ दो
इतना
स्वार्थी हो गया इंसान
मन ही मन कहता है
सूरज तुम चमकना छोड़ दो
गुलाब तुम महकना छोड़ दो
किसी का सुख किसी की ख़ुशी
अब स्वीकार नहीं उस को
मन पर अहम का
आधिपत्य हो गया
स्वयं के सिवाय कोई
अच्छा लगता नहीं उस को
दिखाने को कहता है
प्रेम भाईचारा चाहता है
पर देता नहीं किसी को
काठ के हृदय निष्ठुर मन से
अब जीता है इंसान
मन ही मन कहता है
सूरज तुम चमकना छोड़ दो
गुलाब तुम महकना छोड़ दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
अहम,स्वार्थ,इंसान,जीवन,

38-25-05-2015