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सोमवार, 11 मई 2015

सुकून से जीने दो

सुकून से जीने दो
दिन का उजाला
तुम रख लो
मुझे शाम का
सांवलापन ही दे दो
सारी ख्वाहिशें
तुम पूरी कर लो
मुझ पर खुदा का
रहम ही रहने दो
बड़ी इमारत में
तुम रह लो
मुझे छोटे से 
घर में ही रहने दो
नफरत रंजिश
तुम कर लो
मुझ को मोहब्बत
करने दो
बेचैनियों का
सामान 
तुम इकठ्ठा कर लो
मुझे सुकून से
जीने दो

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सुकून,नज़्म,शायरी,नफरत,मोहब्बत
37-11-05-2015

बहता पानी हूँ

बहता पानी हूँ
बहता पानी हूँ
रोका तो
अपने में
सदा के लिए
रुक जाऊंगा
रिश्ते नाते दोस्त
सब भूल जाऊंगा
संसार से दूर होता
चला जाऊंगा
एक दिन
बुझ जाऊंगा
यादों में
रह जाऊंगा
डा,राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,

36-11-05-2015

काँटों के बीच रहता हूँ

काँटों के बीच रहता हूँ 
काँटों के बीच
रहता हूँ 
लहूलुहान होता हूँ
दर्द में तड़पता हूँ
चुपचाप सहता हूँ
कैक्टस सा जीता हूँ
ईश्वर में
आस्था रखता हूँ,
धैर्य को
लक्ष्य बना कर
निरंतर हँसता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
आस्था,कैक्टस ,धैर्य,लक्ष्य,

35-11-05-2015

रविवार, 10 मई 2015

माँ,तुम हो देवी अवतार

माँ,तुम हो देवी अवतार
माँ कहाँ से लायीं तुम
ये प्रेम स्नेह ममत्व
धैर्य कर्तव्य की
अथाह धन सम्पदा
किसने दिया तुम्हें
सहनशीलता सहृदयता
संवेदनशीलता का उपहार
माँ तुम अहम
अहंकार से परे हो
जीवों में अतुल्य हो
मुख से कुछ नहीं कहोगी
तो भी  करना पड़ेगा 

सच स्वीकार
माँ तुम हो देवी अवतार
करती हो संतान का 

बेडा पार 
तुम्हें शत शत नमन
तुम पर जीवन अर्पण

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
माँ ,ममत्व,मातृत्व,स्नेह 

34-10-05-2015

अजीबो गरीब है ये इंसानों की दुनिया

अजीबो गरीब है ये इंसानों की दुनिया
अजीबो गरीब है
ये इंसानों की दुनिया
चंद लोगों को ही मिलती है
धन दौलत
सर छुपाने को कोठियां
बीत जाती है झोंपड़ी
फुटपाथ पर ज़िंदगियाँ
ना दो वक़्त रोटी का पता
ना खेलने को मैदान
बचपन में बुढ़ापा
देख लेती हैं ज़िंदगियाँ
बीमारी में सांस लेते लेते
चल बसती हैं ज़िंदगियाँ
सुबह से शाम जी तोड़ मेहनत
फिर भी दर्द से
बिलबिलाती हैं ज़िंदगियाँ
हँसती नहीं उससे ज्यादा
रोती हैं ज़िंदगियाँ
चिलचिलाती धूप
आंधी बरसात में
तिल तिल कर मरती हैं
ज़िंदगियाँ
सभ्य आँखों को
खटकती हैं ज़िंदगियाँ
बड़ी अजीब है
ये इंसानों की दुनिया
चंद लोगों को ही मिलती है
धन दौलत
सर छुपाने को कोठियां

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
33-10-05-2015

दुनिया,गरीब,गरीबी ,इंसान