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बुधवार, 4 फ़रवरी 2015

शक


लोगों के
सवालों का
उत्तर देते देते
थक गया हूँ
उनके शक की
बीमारी से
इतना डर गया हूँ
अब खुद पर भी
शक करने लगा हूँ
कभी कभी खुद को
छू कर देखता हूँ
कभी आईने में
झांकता हूँ
कभी मित्रो से
पूछता हूँ
मैं हूँ भी या नहीं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शक,जीवन

03-04-02-2015

सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

गम भी हैं मज़बूरियां भी हैं

गम भी हैं मज़बूरियां भी हैं
गम भी हैं
मज़बूरियां भी हैं
जब मुझे ही सहना है
मुझे ही करना है
क्यों किसी को
अहसास कराऊँ
हँसते हँसते लड़ता रहूँ
सब्र से जीता रहूँ
खुदा की
इबादत करता रहूँ
ज़िंदगी से ज़द्दोज़हद का 
यही तरीका बेहतर 
समझता हूँ 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   
शायरी,सब्र,ज़िंदगी,गम,

02-02-02-2015

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

रात गुजरी मगर बात नहीं गुजरी


रात गुजरी मगर बात नहीं गुजरी
रात गुजरी मगर
बात नहीं गुजरी
हर शब्द की प्रतिध्वनि
अब भी कानों में गूँज रही है
मन में विचारों का
तांडव मचा रही है
ह्रदय को झंझोड़ रही है
ग्लानि से
आँखें नम हो रही हैं
पुरुष होने पर
शर्म आ रही थी
उसके स्वर में याचना थी
आँखों में दया की भीख थी
इतना ही तो कहा था उसने
तुम्हारी बेटी से भी छोटी हूँ
स्नेह नहीं दे सकते
पर मेरा
बचपन तो ना छीनो
समय से पहले
मुझे बालिका से
औरत मत बनाओ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
नारी,स्त्री,अभागिन,

01-01-02-2015