ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 9 मई 2015

बड़े बूढ़ों की छत्र छाया में

बड़े बूढ़ों की छत्र छाया में
बड़े बूढ़ों की
छत्र छाया में समय
कितनी सरलता से
गुजरा
कभी अहसास
तक नहीं हुआ
उनके सब्र के पैमाने
स्थितियों से
निबटने के तरीके
कभी सार्थक नहीं लगे
आज जब वो नहीं हैं
उनकी सार्थकता का
पता चल रहा है
स्वयं पर क्रोध आ रहा है
उनके जीवन काल में
उनके सोच
उनके अनुभव और 
व्यवहार को
क्यों समझ नहीं पाया
मन ग्लानि से रो रहा है

डा,राजेंद्र तेला,निरंतर
29-09-05-2015

बड़े बूढ़े,बुजुर्ग,अनुभव ,जीवन

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें