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सोमवार, 4 मई 2015

वक़्त ही तो बदला है

वक़्त ही तो बदला है
कभी आँखों में
हर दिन
नया ख्वाब रहता था
वक़्त ही तो बदला है
मगर अब आँखों में
दर्द का साया रहता है
उम्मीदों का
चमकता सूरज
अब अँधेरे में डूब गया है
महते फूलों के बीच
रहने वाला
अब सूखे फूल
किताबों में रखता है
उन्हें देख कर
बीते वक़्त को याद कर
मुस्कारने की
कोशिश करता है
मगर लब भी साथ नहीं देते
कोई नया दर्द छुपा है
सोच कर लब तक
खामोश हो जाते हैं
सहने के लिए
मुझे तनहा छोड़ देते हैं
वो भी क्या दिन थे
याद कर तन्हाई में
आसूं बहाता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
दर्द,वक़्त,समय,ज़िंदगी,

17-04-05-2015

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