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सोमवार, 25 मई 2015

सूरज तुम चमकना छोड़ दो गुलाब तुम महकना छोड़ दो

सूरज तुम चमकना छोड़ दो
गुलाब तुम महकना छोड़ दो
इतना
स्वार्थी हो गया इंसान
मन ही मन कहता है
सूरज तुम चमकना छोड़ दो
गुलाब तुम महकना छोड़ दो
किसी का सुख किसी की ख़ुशी
अब स्वीकार नहीं उस को
मन पर अहम का
आधिपत्य हो गया
स्वयं के सिवाय कोई
अच्छा लगता नहीं उस को
दिखाने को कहता है
प्रेम भाईचारा चाहता है
पर देता नहीं किसी को
काठ के हृदय निष्ठुर मन से
अब जीता है इंसान
मन ही मन कहता है
सूरज तुम चमकना छोड़ दो
गुलाब तुम महकना छोड़ दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
अहम,स्वार्थ,इंसान,जीवन,

38-25-05-2015

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