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सोमवार, 2 फ़रवरी 2015

गम भी हैं मज़बूरियां भी हैं

गम भी हैं मज़बूरियां भी हैं
गम भी हैं
मज़बूरियां भी हैं
जब मुझे ही सहना है
मुझे ही करना है
क्यों किसी को
अहसास कराऊँ
हँसते हँसते लड़ता रहूँ
सब्र से जीता रहूँ
खुदा की
इबादत करता रहूँ
ज़िंदगी से ज़द्दोज़हद का 
यही तरीका बेहतर 
समझता हूँ 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर   
शायरी,सब्र,ज़िंदगी,गम,

02-02-02-2015

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