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रविवार, 1 फ़रवरी 2015

रात गुजरी मगर बात नहीं गुजरी


रात गुजरी मगर बात नहीं गुजरी
रात गुजरी मगर
बात नहीं गुजरी
हर शब्द की प्रतिध्वनि
अब भी कानों में गूँज रही है
मन में विचारों का
तांडव मचा रही है
ह्रदय को झंझोड़ रही है
ग्लानि से
आँखें नम हो रही हैं
पुरुष होने पर
शर्म आ रही थी
उसके स्वर में याचना थी
आँखों में दया की भीख थी
इतना ही तो कहा था उसने
तुम्हारी बेटी से भी छोटी हूँ
स्नेह नहीं दे सकते
पर मेरा
बचपन तो ना छीनो
समय से पहले
मुझे बालिका से
औरत मत बनाओ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
नारी,स्त्री,अभागिन,

01-01-02-2015

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