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गुरुवार, 31 दिसंबर 2015

Life is a waiting game

Life is a waiting game
Life is a waiting game
One keeps waiting
To accomplish
Ambitions aspirations
Desires and goals
Waits to fulfill
Contentment
Peace and solace
How much one may try?
One after the other
Some obstacle intervenes
Leaving the mind puzzled
 The heart unfulfilled
Death is the only thing
Of which one is sure
Sooner or later it comes
Dr.Rajendra Tela,Nirantar
31-12-2015

Life,wait

Encounter

Encounter
=========
My first
Encounter with her
Was not between
Two persons
Two hearts
Or two minds
Eyes were the culprit
No sooner they met
They refused to close
As if they did not want to
Miss a moment of
What they saw
The heart had to listen
The mind intervened
Encounter of the eyes
Turned into defeat for me
Victory for her
I had surrendered myself
To her beauty
She had conquered
My heart and soul
Dr.Rajendra Tela,Nirantar
31-12-2015
beauty,love,encounter

Honesty

Honesty
========
It is neither easy
Nor very difficult
To keep one’s
Honesty intact
End of the day
It is the price
That matters
If one falls prey
He is dishonest
If one does not
He remains honest
Dr.Rajendra Tela,Nirantar
Honesty,life

31-12-2015

Stillness

Stillness
========
Life is neither still
Nor does anybody wants it to be
Still like a dead wood
Pebbles of grief sorrow happiness
Desires people events happenings
Keeps stirring life’s still water
Pushes the stillness
Out of the periphery of silence
Death is the only happening
Which welcomes the stillness?
Pushing emotions desires
Away from life
Silences the heart and mind
To a peaceful rest
Dr.Rajendra Tela,Nirantar
life,stillness,silence
31-12-2015


Think before you act

Think before you act
================
Left and right
Front and behind
Sitting on a tree branch
The little sparrow
Looked all around
Reassured herself
Of safety from
Prowling killers
Flew to the garden
From the oak tree branch
Again looked all around
To ensure her life
From hidden enemy
Cautiously took step by step
Plucked a weed
 From the green grass
Did not waste time
Flew back to build her nest
Think before you act
Taught the world

Dr.Rajendra Tela,Nirantar
cautious,think,careful
31-12-2015

शुक्रवार, 12 जून 2015

संसार एक रंग मंच न्यारा

संसार एक रंग मंच न्यारा
संसार
एक रंग मंच न्यारा
नित नया
नाटक होता यहां
दर्शक बदलते 
कलाकार बदलते
साज सज्जा बदलती
वेश भूषा भाषा बदलती
मंच पर्दा निर्माता
निर्देशक नहीं बदलते यहाँ
कभी हँसना नाचना
कभी रोना धाना होता यहाँ
कभी सुखद कभी दुखद
नाटक खेला जाता यहां
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
नाटक,संसार,रंग मंच,जीवन

45-12-06-2015

मंगलवार, 26 मई 2015

मन की खिड़की

मन की खिड़की
बंद खिड़की से
ना उजाला आता
ना हवा आती
अध खुली खिड़की से
हवा भी कम आती
उजाला भी कम आता
कमरे में घुटन
और अँधेरा हो जाता
खुली खिड़की से
हवा भी पूरी आती
उजाला भी पूरा आता
मन की खिड़की
हृदय के कपाट खुले हो
मन विकार रहित
जीवन सुलभ हो जाता 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
अँधेरा,उजाला,मन,हृदय,जीवन,

44-26-05-2015

तेरी ज़िंदगी में मेरा कोई ज़िक्र नहीं है

तेरी ज़िंदगी में मेरा कोई ज़िक्र नहीं है
तेरी ज़िंदगी में
मेरा कोई ज़िक्र नहीं है
मगर मेरी ज़िंदगी के
हर पन्ने की हर इबारत
तेरे ज़िक्र से भरी हुई है
हर ख्याल में
तेरी सूरत सजी है
ये बदकिस्मती ही है
मेरी ज़िंदगी अधूरी है
हसरतों को खुदा की
मंज़ूरी नहीं है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
नज़्म,शायरी,मोहब्बत,हसरत,

43-26-05-2015

अहम का कोहरा

अहम का कोहरा
कुछ लोग
अपने आप से घिरे हैं
अहम के कोहरे से
ढके हैं
मोहब्बत से परे हैं
भ्रम में जी रहे हैं
आइना देखने की
फुर्सत नहीं
आइना दिखाने में
लगे हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
अहम, जीवन

42-26-05-2015

कहने को बातें बहुत हैं

कहने को बातें बहुत हैं
कहने को बातें बहुत हैं
कहूँ जितना ही कम हैं
मौसम से प्रारम्भ होगी
देश विदेश,राजनीति 
टीवी सिनेमा से होते हुए
घर परिवार में पहुँच जाएंगी
रास्ता भटक कर
लोगों पर अटक जायेगी
मन की कुंठा बाहर आएगी
किसी की प्रशंसा
किसी की बुराई होगी
जुबां गन्दी हो जायेगी
सोच पर प्रश्न खड़ा करेगी
क्यों ना कम कह कर
कम चलाऊं
जितनी आवश्यक
उतनी बात करूँ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
बातें,कहना,जीवन

41-26-05-2015

सोमवार, 25 मई 2015

शब्दों का खेल

शब्दों का खेल
ना किसी
कविता में दर्द होता है
ना कोई गीत
दुःख से भरा होता है
ना प्यार मोहब्बत
किसी ग़ज़ल में होता है
ना ही किसी नज़्म में
जुदाई बेवफाई होती
सब शब्दों का खेल है
मन संवेदनशील
भावनाओं से युक्त ना हो
मानवता का सोच न हो
कविता हो या ग़ज़ल
सब इकसार लगते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
कविता,ग़ज़ल,नज़्म,गीत

40-25-05-2015

"मैं "बस गया हृदय में

"मैं "बस गया हृदय में
दूसरों में अवगुण ढूंढना
स्वयं के अवगुण छुपाना
मानवता की बात करना
अमानवीय काम करना
धर्म हो गया इंसान का
धन संचय अहम स्वार्थ
ईर्ष्या द्वेष होड़ में जीना
लक्ष्य हो गया इंसान का
"मैं "बस गया मन में
समाहित हो गया हृदय में
अब नहीं रहा इंसान
जैसा चाहा था भगवान ने

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
भगवान,अहम,स्वार्थ,होड़,जीवन
39-25-05-2015

सूरज तुम चमकना छोड़ दो गुलाब तुम महकना छोड़ दो

सूरज तुम चमकना छोड़ दो
गुलाब तुम महकना छोड़ दो
इतना
स्वार्थी हो गया इंसान
मन ही मन कहता है
सूरज तुम चमकना छोड़ दो
गुलाब तुम महकना छोड़ दो
किसी का सुख किसी की ख़ुशी
अब स्वीकार नहीं उस को
मन पर अहम का
आधिपत्य हो गया
स्वयं के सिवाय कोई
अच्छा लगता नहीं उस को
दिखाने को कहता है
प्रेम भाईचारा चाहता है
पर देता नहीं किसी को
काठ के हृदय निष्ठुर मन से
अब जीता है इंसान
मन ही मन कहता है
सूरज तुम चमकना छोड़ दो
गुलाब तुम महकना छोड़ दो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
अहम,स्वार्थ,इंसान,जीवन,

38-25-05-2015

सोमवार, 11 मई 2015

सुकून से जीने दो

सुकून से जीने दो
दिन का उजाला
तुम रख लो
मुझे शाम का
सांवलापन ही दे दो
सारी ख्वाहिशें
तुम पूरी कर लो
मुझ पर खुदा का
रहम ही रहने दो
बड़ी इमारत में
तुम रह लो
मुझे छोटे से 
घर में ही रहने दो
नफरत रंजिश
तुम कर लो
मुझ को मोहब्बत
करने दो
बेचैनियों का
सामान 
तुम इकठ्ठा कर लो
मुझे सुकून से
जीने दो

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सुकून,नज़्म,शायरी,नफरत,मोहब्बत
37-11-05-2015

बहता पानी हूँ

बहता पानी हूँ
बहता पानी हूँ
रोका तो
अपने में
सदा के लिए
रुक जाऊंगा
रिश्ते नाते दोस्त
सब भूल जाऊंगा
संसार से दूर होता
चला जाऊंगा
एक दिन
बुझ जाऊंगा
यादों में
रह जाऊंगा
डा,राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,

36-11-05-2015

काँटों के बीच रहता हूँ

काँटों के बीच रहता हूँ 
काँटों के बीच
रहता हूँ 
लहूलुहान होता हूँ
दर्द में तड़पता हूँ
चुपचाप सहता हूँ
कैक्टस सा जीता हूँ
ईश्वर में
आस्था रखता हूँ,
धैर्य को
लक्ष्य बना कर
निरंतर हँसता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
आस्था,कैक्टस ,धैर्य,लक्ष्य,

35-11-05-2015

रविवार, 10 मई 2015

माँ,तुम हो देवी अवतार

माँ,तुम हो देवी अवतार
माँ कहाँ से लायीं तुम
ये प्रेम स्नेह ममत्व
धैर्य कर्तव्य की
अथाह धन सम्पदा
किसने दिया तुम्हें
सहनशीलता सहृदयता
संवेदनशीलता का उपहार
माँ तुम अहम
अहंकार से परे हो
जीवों में अतुल्य हो
मुख से कुछ नहीं कहोगी
तो भी  करना पड़ेगा 

सच स्वीकार
माँ तुम हो देवी अवतार
करती हो संतान का 

बेडा पार 
तुम्हें शत शत नमन
तुम पर जीवन अर्पण

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
माँ ,ममत्व,मातृत्व,स्नेह 

34-10-05-2015

अजीबो गरीब है ये इंसानों की दुनिया

अजीबो गरीब है ये इंसानों की दुनिया
अजीबो गरीब है
ये इंसानों की दुनिया
चंद लोगों को ही मिलती है
धन दौलत
सर छुपाने को कोठियां
बीत जाती है झोंपड़ी
फुटपाथ पर ज़िंदगियाँ
ना दो वक़्त रोटी का पता
ना खेलने को मैदान
बचपन में बुढ़ापा
देख लेती हैं ज़िंदगियाँ
बीमारी में सांस लेते लेते
चल बसती हैं ज़िंदगियाँ
सुबह से शाम जी तोड़ मेहनत
फिर भी दर्द से
बिलबिलाती हैं ज़िंदगियाँ
हँसती नहीं उससे ज्यादा
रोती हैं ज़िंदगियाँ
चिलचिलाती धूप
आंधी बरसात में
तिल तिल कर मरती हैं
ज़िंदगियाँ
सभ्य आँखों को
खटकती हैं ज़िंदगियाँ
बड़ी अजीब है
ये इंसानों की दुनिया
चंद लोगों को ही मिलती है
धन दौलत
सर छुपाने को कोठियां

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
33-10-05-2015

दुनिया,गरीब,गरीबी ,इंसान

शनिवार, 9 मई 2015

आत्म मंथन

आत्म मंथन
ठहरे जल को
गंदगी दूषित कर
सड़ने लगती
बहती नदी में गंदगी
मंझधार से हट कर
किनारों पर चली जाती
जल को दूषित होने से
बचाती
निरंतर आत्म मंथन से
मन की गंदगी भी
किनारे पर चली जाती
सोच को स्वच्छ
आचार व्यवहार को
मधुर बनाती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सोच,आत्ममंथन,जीवन, आचार व्यवहार

32-09-05-2015

खरा सिक्का

खरा सिक्का
सच को झूठ
झूठ को सच कहना
अब आम हो गया है
होड़ के दौड़ में
येन केन प्रकारेण
जीतना ध्येय हो गया 
जो जीत गया
उस के सर पर ताज 
जो हार गया
वो कमजोर खिलाड़ी 
जो चल गया
वो खरा सिक्का 
जो ना चला
कितना भी अच्छा हो
खोटा सिक्का हो गया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
31-09-05-2015

सच,झूठ,हार,जीत,जीवन,

त्रासदी

(नेपाल में भूकम्प त्रासदी पर)
त्रासदी
प्रकृति के रौद्र पर
मानव संहार पर
हृदय व्यथित
मन बेचैन
सोच जड़
कलम चुप है
नम आँखों से
मृत आत्माओं को
शत शत नमन है
निश्छल हृदय से
श्रद्दांजलि अर्पण है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
भूकम्प,त्रासदी,प्राकृतिक विपदा

30-09-05-2015

बड़े बूढ़ों की छत्र छाया में

बड़े बूढ़ों की छत्र छाया में
बड़े बूढ़ों की
छत्र छाया में समय
कितनी सरलता से
गुजरा
कभी अहसास
तक नहीं हुआ
उनके सब्र के पैमाने
स्थितियों से
निबटने के तरीके
कभी सार्थक नहीं लगे
आज जब वो नहीं हैं
उनकी सार्थकता का
पता चल रहा है
स्वयं पर क्रोध आ रहा है
उनके जीवन काल में
उनके सोच
उनके अनुभव और 
व्यवहार को
क्यों समझ नहीं पाया
मन ग्लानि से रो रहा है

डा,राजेंद्र तेला,निरंतर
29-09-05-2015

बड़े बूढ़े,बुजुर्ग,अनुभव ,जीवन

शुक्रवार, 8 मई 2015

किसे याद रहती हैं सिसकी गरीब की

किसे याद रहती हैं सिसकी गरीब की
किसे याद रहती
सिसकी गरीब की
किसने समझी
ज़िन्दगी गरीब की
किसने खाई
रोटी गरीब की
किसने पौछी
अश्रुधारा गरीब की
किसने भुगती
त्रासदी गरीब की
किसने महसूस करी
लाचारी गरीब की
किसने देखी 
झोपडी गरीब की
किसने लड़ी
लड़ाई गरीब की
सब बात तो करते हैं
गरीबी मिटाने की
काम ऐसे कर रहे हैं
एक दिन
मिट जाएगा गरीब ही
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
28-08-05-2015

गरीब, गरीबी

नारी ,

नारी
पुरुष के पीछे
अर्धांगिनी बन कर
खडी होती है नारी ,
सुख दुःख में
साथ देती है नारी
सफलता में
सहायक होती है नारी
पुरुषों से
अधिक सहनशील
अधिक सहती है नारी 
ममत्व में स्नेह की
पराकाष्ठा होती है नारी
शक्ति का रूप
धैर्य का प्रतीक
महान होती है नारी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

नारी 
27-08-05-2015

गुरुवार, 7 मई 2015

रूठना मनाना

रूठना मनाना
किस को मनाऊं
कैसे मनाऊं
मन को मनाऊं
लोगों को मनाऊं
मन को मनाऊं
तो लोग नाराज़
लोग नाराज़ तो
नया दुश्मन बनाऊं 
लोगों को मनाऊं
तो मन नाराज़
मन नाराज़ तो
जीना दुश्वार
समझ नहीं आता
किस को मनाऊं
कैसे मनाऊं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
26-07-05-2015

जीवन,रूठना मनाना

सब कुछ है फिर भी कुछ नहीं हैं


सब कुछ है
फिर भी कुछ नहीं हैं
घोड़े हैं
तो मैदान नहीं
मैदान है
तो घोड़े नहीं
घोड़े भी हैं
मैदान भी है
मगर मन नहीं
तो कुछ नहीं
सब कुछ है
फिर भी कुछ नहीं हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मन,जीवन

25-07-05-2015

What to say? What not to say?

What to say? What not to say?
What to say?
What not to say?
When to say?
When not to say?
Always remains
A burning question
Saying anything
May be
Pleasant for one
Unpleasant
For the other
So whenever
One has to say
Before saying
One has to think
Twice
Learn the right
Way of saying
Dr.Rajendra Tela,Nirantar
COMMUNICATION,

25-07-05-2015

बुधवार, 6 मई 2015

अवरोधों की आँधियों के बीच

अवरोधों की आँधियों के बीच
वृक्ष के पत्ते सा
फड़फड़ाया हूँ
निराशा की
गर्मी में झुलसा हूँ
असफलता के
आसूओं की
वर्षा में भीगा हूँ
अतिवृष्टि से त्रस्त
पंछी जैसे सहमा हूँ
कैक्टस जैसे ज़िया हूँ
भाग्य से लड़ता रहा हूँ
अवरोधों की
आँधियों के बीच
जीवन के मरुस्थल में
अविचल खड़ा हूँ
विश्वास से भरपूर हूँ
हरीतिमा की आशा में
टूट कर जुड़ता रहा हूँ
अब भी हार नहीं मानूंगा
जीत कर दिखाऊंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,अविचल,अवरोध,दुःख ,सुख

24-06-05-2015

मन का शैतान

मन का शैतान
झाँका जो
मन के अंदर
सुन्दर चेहरे वाला
शैतान नज़र आया
कब से बैठे हो
चुप क्यों हो
बाहर आकर दुनिया को
अपना सुन्दर चेहरा
क्यों नहीं दिखाते
शैतान ने
अट्टाहास किया
आँख
मटकाते हुए बोला
चुप रह कर भी
जो चाहता हूँ
तुम से करवा लेता हूँ
बाहर आ जाऊंगा
तो तुम्हारे चेहरे पर चढ़ा
चेहरा उतर जाएगा
लोगों को तुम्हारे सत्य
पता चल जाएगा
मुझे भी दूसरा
ठिकाना ढूंढना पड़ेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मन,शैतान,जीवन,चेहरे पर चेहरा

23-06-05-2015

मंगलवार, 5 मई 2015

ज़ख्मों की सीमाएं

ज़ख्मों की सीमाएं
ज़ख्मों की भी
सीमाएं होती होगी
दर्द की भी
इंतहा होती होगी
मुझे तो पता नहीं
किसी को पता हो
तो बता दे
दर्द से मुक्ति नहीं तो
लक्ष्य का तो पता
चल ही जाएगा
कितना और सहना है
मालूम हो जाएगा
चैन का
सूरज कब उगेगा
आशाओं को
उत्तर मिल जाएगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
दुःख,दर्द,आशाएं,चैन,जीवन 

22-05-05-2015