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शनिवार, 15 नवंबर 2014

पानी पर कविता -चाहो तो जल कह दो


चाहो तो जल कह दो
चाहो तो पानी कह दो
चाहो तो आँख के आसूं
शरीर का पसीना कह दो
नाम कोई भी दे दो
नदी नाले में बहता हूँ
लहर बन कर समुद्र में
उछलता मचलता हूँ
कुए तालाब बांधों में
सीमाओं में बंध जाता हूँ
रात में ओस बन कर
पत्तों पर छा जाता हूँ
बादलों में बस कर
धरती को भिगोता हूँ
प्यासे की प्यास 
बुझाता हूँ
जीवों को जीवित 
रखता हूँ
ईश्वर की देन हूँ
प्रकृति का
अत्युत्तम रूप हूँ

542-05-15-11-2014

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जल.पानी,नीर,आसूं,प्रकृति,जीवन,

दिल करे तो क्या करे


दिल करे तो
क्या करे
मन कहे तो
किस से कहे
कोई जिए तो
कैसे जिए
जब ख्वाहिशें
अधूरी हो
चाहतों से दूरी हो
हसरतों की
नाकामी हो
ज़िंदगी
दायरों में बंधी हो
आँखों में नमी हो
लबों पर
झूठी हँसी हो
दिल करे तो
क्या करे
मन कहे तो
किस से कहे
541-04-15-11-2014
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

ज़िंदगी,मोहब्बत,दायरे,दिल 

सोमवार, 10 नवंबर 2014

संस्कारों का अर्थ बदलना होगा


ना तो अब
दशरथ से पिता होते हैं
ना ही राम से पुत्र होते हैं
किसी को
वनवास जाना पड़ेगा
तो पिता को
जाना पड़ेगा
समय के
साथ चलना पड़ेगा 
पुत्र की हर बात को
हँस कर मानना पड़ेगा
बुढ़ापे का
सहारा बनाना होगा
संस्कारों का
अर्थ बदलना होगा
रामायण का
नया रूप लिखना पड़ेगा
अयोध्या को
चित्रकूट बताना पड़ेगा  
540-03-10-11-2014

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
राम,दशरथ,अयोध्या,चित्रकूट,बुढ़ापा,

रविवार, 9 नवंबर 2014

कहने को तो बहुत कुछ कह सकता हूँ

कहने को तो बहुत कुछ कह सकता हूँ

कहने को तो
बहुत कुछ
कह सकता हूँ
लम्बी लम्बी बातें
कर सकता हूँ
आवश्यक हो तो
चुप भी रहता हूँ
पर उतना ही
कहता हूँ
सुनने वाला
ना झुंझलाए
ना समय गँवाए
आसानी से
समझ जाए
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
539-02-09-11-2014

संवाद,कहना,सुनना.जीवन,selected