ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 25 अक्तूबर 2014

पैमाने

पैमाने 
=====

क्यों
हम किसी को
संदेह का
लाभ नहीं देते
एक वाक्य
एक घटना को
एक हरकत को
किसी के
व्यक्तित्व का
पैमाना बना लेते हैं
अपने सोच से
उसे अच्छा बुरा
समझने लगते हैं
त्रुटि हर
मनुष्य से होती है
गलत बात
हर मुंह से निकलती है
जानते हुए भी
खुद संदेह का
लाभ चाहते हैं
खुद के लिए
अलग पैमाने
दूसरों के लिए
अलग पैमाने रखते हैं

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
535-26-25--10-2014

संदेह,जीवन,व्यवहार,सोच,पैमाना

दुखों से दोस्ती

दुखों से दोस्ती

दुखों से
दोस्ती नहीं करता
तो ज़ुबान को चुप
कैसे रख पाता
दुनिया के सामने
खुद का
तमाशा बनाता
किस ना किसी को
दोषी बताता 
दुःख तो कम नहीं होते
एक दुश्मन बढ़ा लेता
दुखों की सूची में
नया दुःख जोड़ देता
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
534-25-25--10-2014

दुःख,मित्र,दोस्ती,जीवन

जो जितना करीब होता है

जो जितना  करीब होता है

जो जितना
करीब होता है
उतना ही बारीकी से
हर बात को
परखता है
बड़ी अच्छाइयाँ 
भूल कर
छोटी बुराइयों में
रम जाता है
मनुष्य के
व्यक्तित्व का
सत्य मान लेता है
खुद को साहूकार
दुसरे को चोर
समझता है
संबंधों को
ध्वस्त कर देता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
533-24-25--10-2014

जीवन,परखना,अच्छाइयाँ,बुराइयां,सम्बन्ध

यूँ तुम्हारा बेवज़ह खौफ खाना


यूँ तुम्हारा
बेवज़ह खौफ खाना
मुझे समझ नहीं आता
गुनाह किया नहीं
गुनाहगार कहना
भी समझ नहीं आता
फैसला करने से पहले
मेरी इल्तजा पर
गौर कर लेना
मेरी निगाहों से खुद को
इक बार देख लेना
दिल तुम्हारा भी नहीं मचले
तो गुनाहगार करार दे देना
मुझे जो चाहे सजा दे देना
मचल जाए तो
पैगाम-ऐ-मोहब्बत
समझ कर
कबूल कर लेना
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
532-23-25--10-2014

चाहत,मोहब्बत,शायरी,

बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

चेहरा सुन्दर ह्रदय कठोर था

चेहरा सुन्दर  ह्रदय कठोर था

चेहरा सुन्दर
ह्रदय कठोर था
रंग गोरा
ह्रदय काला था
बुद्धि से कुशाग्र
मगर संवेदनहीन था
खूबसूरत गुलदान में
गुल तो बहुत थे
मगर महकता
एक भी ना था
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
531-22-22--10-2014

संवेदना,संवेदनहीन ,बुद्धि,जीवन,गुण

किसी की मानूं ना मानूं

किसी की मानूं ना मानूं

किसी की मानूं
ना मानूं
आईने की हर बात
मान लेता हूँ
चेहरे की
झुर्रियों से ले कर
चेहरे के दाग तक
दिखा देता है
डरता हूँ
कहीं नाराज हो कर
दिल में छुपे राज
दुनिया को नहीं बता दे
इसलिए आईने को
सदा खुश रखता हूँ
उसकी हर बात को
सर झुका कर
मान लेता हूँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
530-21-22--10-2014

आइना,ज़िंदगी,

तुम अगर हम से ना मिलते

तुम अगर हम से ना मिलते

तुम अगर
हम से ना मिलते
ख्वाब ना दिखाते
ना मंज़िल के
रास्ते बदलते
ना उम्मीदों के
सिलसिले बनते 
सुकून से जी रहे होते
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
529-20-22--10-2014
अफ़साने,मोहब्बत,इल्जाम,तन्हाई,शायरी

मंगलवार, 21 अक्तूबर 2014

मेरा ईश्वर मेरे मन में बसा है


कभी गया नहीं काशी मथुरा
देखा नहीं तिरुपति उज्जैन
ना डुबकी लगाई संगम में
ना करी चार धाम की यात्रा
जीता रहा स्नेह भाईचारे से
कर्म करता रहा सच्चाई से
सत्य के पथ पर चलता रहा
मेरे घर के छोटे से मंदिर में
नित्य प्रभु दर्शन करता रहा
त्रुटियों की क्षमा माँगता रहा
मन की इच्छा कभी हुई नहीं
पुण्य कमाने तीर्थ यात्रा जाऊं
प्रभु को कही ओर शीश नवाऊँ
मेरा ईश्वर मेरे मन में बसा है
कभी उससे अलग ना हो पाऊँ
केवल इसी इच्छा से जीता हूँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
528-19-21--10-2014

पूजा,अर्चना,ईश्वर,मंदिर,तीर्थ,जीवन,प्रभु

सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

मैं पहल करता हूँ


ना जाने क्यों तुमने
क्रोध को विवेक पर
हावी होने दिया
आसानी से कह दिया
मुझ से कोई रिश्ता
नहीं रखना चाहते
पर कहने से पहले
सोचा नहीं
रिश्ता मेरा ही नहीं
तुम्हारा भी टूटेगा
हृदय मेरा ही नहीं
तुम्हारा भी दुखी होगा
कहने से पहले
दो बार सोच लेते
क्रोध ठंडा होने के बाद
बैठ कर बात कर लेते
महायुद्ध भी संवाद से ही
समाप्त हुए हैं
मेरा तुम्हारा तो
वर्षों का साथ था
बार बार मिलने से
रिश्ता बना था
कैसे एक क्षण में उसे
क्रोध की भेंट चढ़ा दिया
अब भी समय है
तुम नहीं करना चाहो तो
अहंकार छोड़ कर
मैं पहल करता हूँ
संवाद से
मन को भ्रांतियों से
मुक्त कर दें
टूटे रिश्ते को
फिर से जोड़ दें
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

527-18-20--10-2014
क्रोध,विवेक,सम्बन्ध,जीवन,संवाद ,रिश्ता,रिश्ते

रिश्तों का रक्तचाप


मौसम के मानिंद
रिश्तों का रक्तचाप भी
निरंतर झूले सा
झूलता रहता है
कभी घटता
कभी बढ़ता
तो कभी सामान्य
हो जाता है
झुंझलाहट में
क्रोध में तनाव में
बढ़ जाता है
ख़ुशी में,सोहाद्र में 
मिल जुल कर हँसने से 
सामान्य हो जाता है
अपनों की पीड़ा
दुविधा को देख कर
दर्द की अनुभूति से 
कम हो जाता है
मौसम के मानिंद
रिश्तों का रक्तचाप
भी बार बार
बदलता रहता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
526-17-20--10-2014

रिश्ते,मौसम,रक्तचाप,जीवन