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शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

मेरे कमरे की खिड़की


हर सुबह
आँख खुलते  ही
खिड़की पर बैठी
नन्ही गोरैया
चचहाट से
मेरा स्वागत करती है
सूर्य रश्मियाँ
कमरे के साथ साथ
मेरे मन को भी
उजाले से भर देती है
अलसाया सा
उठ कर खिड़की से
बाहर देखता हूँ
घर के बगीचे में लगे
चंपा के
सुन्दर महकते फूल
आँखों की
थकान मिटा देते हैं
सुबह की
ठंडी हवा का झोंका
रात भर की सुस्ती को
दूर करते हुए
मेरे चेहरे को छू कर
निकल जाता है
बाहर सड़क पर
हँसते खेलते
स्कूल जाते नन्हे बच्चों को
दिखते ही हृदय भी
प्रफुल्ल हो जाता है
मेरे कमरे की खिड़की
साधारण खिड़की ही नहीं
मेरी हर सुबह को
आनंद उत्साह
प्रदान करने वाली
सहृदयी मित्र भी है
कभी कभी सोचता हूँ
अगर कमरे में खिड़की
उस स्थान पर नहीं होती
तो भी क्या हर सुबह
इतनी ही सुन्दर होती 

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
514-06-11--10-2014

सुबह,प्रकृति,जीवन,प्रफुल्ल्ता,खिड़की


कुछ तो दुःख समुद्र के भी होंगे


कुछ तो दुःख
समुद्र के भी होंगे
बार बार उफनता है
पानी छलकाता हैं
दुःख में मैंने कुछ
आसूं छलका दिए
तो क्यों इतना
बतंगड़ बनाते हो
समुद्र शक्तिशाली है
उसे कुछ नहीं कहते हो
मुझे कमज़ोर समझ
दबाते हो
क्यों भूल जाते हो
बड़ा हो या छोटा
दुःख तो दुःख होते हैं
सब को कष्ट देते हैं
फिर क्यों अपने दुःख
तुम्हें दूसरों के दुखों से
अधिक लगते हैं
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
513-05-11--10-2014
कमज़ोर,जीवन,अत्याचार,निरंकुशता,

फूलों की ख्वाहिश में


फूलों की
ख्वाहिश में
काँटों से पाला पड़ा
ज़ख्म खाकर
हमने
इरादा बदल दिया
जो भी मिला
उसी से
दिल लगा लिया
काँटों को भी
फूल समझ कर
अपना बना लिया 
 © डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
512-04-11--10-2014

प्रेम.ख्वाहिश,प्यार,मोहब्बत

रविवार, 5 अक्तूबर 2014

बिना कांच की खिड़की


ज़िंदगी
बिना कांच की खिड़की
जैसी हो गयी है
जिस में से
ठंडी हवा आती है
तो धूल भरी
आंधी भी आती है
सुबह की नरम धूप
हृदय को
उजाले से भरती है
दोपहर की तेज़ धूप
मन को झुलसा देती है
न ख़ुशी अधिक देर
टिकती है
न निराशा अधिक
देर रहती है
न रुकने वाले 
झूले सी निरंतर
खुद तो झूलती ही है
मुझे भी  झुलाती रहती है
स्थायित्व की कामना
पूरी नहीं होने देती

 © डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
511-03-05--10-2014

आशा,निराशा,ख़ुशी,दुःख,ज़िंदगी,जीवन  

अकेले मेरे करने से क्या होगा


शहर के बाज़ार
बगीचों सड़कों
सार्वजनिक स्थलों पर
सुन्दर लिखावट में
पट्टिकाओं पर
लिखा होता है
फूल तोडना मना है
छेड़ छाड़ करना
अपराध है
धूम्रपान वर्जित है
गंदगी फैलाना
स्वास्थ्य के लिए
ख़राब है
हर आदमी पट्टिका
देखता अवश्य है
लिखा होता है
वैसा करता नहीं
कोई टोक दे तो उसका
एक ही उत्तर होता है
अकेले मेरे करने से
क्या होगा
जब पूरा देश
बीमार है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
510-02-05--10-2014

देश,सोच,मानसिकता,selected