Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

बुधवार, 24 सितंबर 2014

सफलता




सफलता
मुझे निश्चिंत नहीं
चौकन्ना रखती है
नए सपने देखने की
चाह जगाती हैं
नयी ऊंचाइयां छूने को
प्रेरित करती है
त्रुटियों को सुधारने का
का अवसर देती हैं
नयी संभावनाएं
ढूंढने को बाध्य करती हैं
अनुभव परखने का
मार्ग प्रशस्त करती हैं
मेरा विश्वास बढ़ाती हैं
लक्ष्य प्राप्त करने में  
सहायता करती है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
505-45-24--09-2014
लक्ष्य,सफलता,विश्वास,कर्म,अवसर,जीवन   

मंगलवार, 23 सितंबर 2014

वो ह्रदय ही क्या जो प्रेम ना करें




वो ह्रदय ही क्या

जो प्रेम ना करें

भावनाओं में ना बहे

यादों में खो कर

रोने ना लगे

अपनों के इंतज़ार में

धड़कने ना लगे

अभिभूत हो कर

बहने ना लगे

दुःख में द्रवित ना हो

सुन्दर चेहरे को

देख कर

डोलने ना लगे

वो ह्रदय ही क्या

निरंतर लोगों को

लुभा ना सके
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
504-44-23--09-2014
ह्रदय ,प्रेम

सोमवार, 22 सितंबर 2014

रंग तो वही होते हैं




रंग तो

वही होते हैं

सधी ऊँगलियाँ 
उन्हें सुन्दर चित्र में

बदल देती हैं

वृक्ष भी वही होते हैं

उचित देख भाल से

सुन्दर वृक्षों में

बदल जाते हैं

बच्चे भी वही होते हैं

उचित परवरिश से

अच्छे मनुष्य बनते हैं

उचित 
देखभाल नहीं हो

जीवन का रंग रूप

बदरंग हो जाता है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
503-43-22--09-2014
जीवन,ज़िंदगी,परवरिश,संस्कार,देखभाल

किस गली में खोया बचपन ढूंढूं


किस गली में 
खोया बचपन ढूंढूं
जिस गली में 
कदम बढाता हूँ
सामने से
बंद मिलती है
उलटे कदमों से
लौट जाता हूँ
कहीं नफरत से भरे 
चेहरे दिखते हैं
कहीं ईर्ष्या द्वेष होड़ में
जीते लोग मिलते हैं
कहीं उन लोगों से
मुलाक़ात होती है
जिन्होंने अपना बन कर
धोखा दिया
झंझावत में फंसा हूँ
निश्छल बचपन को
कहाँ और कैसे ढूंढूं
खुल कर हँस सकूं
या इर्ष्या द्वेष की
दुनिया में 
चिंताओं से
त्रस्त जीता रहूँ
जहां माया मोह की
सड़कें तो बड़ी बड़ी हैं
बचपन की सुन्दर
निश्छल गलियाँ नहीं हैं
बचपन की गलियों की
तलाश में भटक रहा हूँ
जहां चैन
भाईचारे से जी सकूं
इच्छाओं को
सीमित कर सकूं 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
502-42-22--09-2014
बचपन,होड़,जीवन,ईर्ष्या,द्वेष