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शनिवार, 5 जुलाई 2014

ज़िंदगी में नया साथ ढूंढ लिया

ज़िंदगी में
नया साथ ढूंढ लिया
अब लफ़्ज़ों को
हमसफ़र बना लिया
ना रूठने का डर
ना मनाने का झंझट
कभी ग़ज़ल
कभी नज़्म लिख कर
खुद ने भी 

सुक़ून पा लियालफ़्ज़ों को भी 
सुक़ून दे दिया
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
405-16-05--07-2014
ज़िंदगी,सुक़ून,लफ्ज़,ग़ज़ल,नज़्म,हमसफ़र,selected 

दिल तो यूँ ही इतराता रहेगा

दिल का क्या
दिल तो यूँ ही
कभी मचलेगा
कभी बहकेगा
कभी उछलेगा
कभी कूदेगा  
कभी रोयेगा
कभी हँसेगा
 कभी रूठेगा
कभी ज़िद पर
अड़ जाएगा
मनाओगे तो
मान जाएगा
बहलाओगे तो
बहल जाएगा
दिल का क्या
दिल तो यूँ ही
इतराता रहेगा
कभी मचलेगा
कभी बहकेगा
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
404-15-05--07-2014
दिल.शायरी,मचलना,बहलाना,selected

क्या तुम्हारी सुनूँ क्या अपनी सुनाऊँ


क्या तुम्हारी सुनूँ
क्या अपनी सुनाऊँ
वही 
दुःख की 
दर्द भरी कहानियां 
सुन सुना भी लेंगे
चैन तो मिलेगा नहीं
दर्द बढ़ा लेंगे
क्यों ना
प्यार भाईचारे की
कहानियां सुनूँ सुनाऊँ
मिले ना मिले
कुछ देर के लिए तो
हृदय को खुश कर लेंगे
आसूं बहाने से भी
बच  जाएंगे

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
403-14-05--07-2014

ज़िंदगी,दर्द,प्यार,दुःख,आसूं,ख़ुशी,selected

शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

वृक्ष पर कविता-कहने को तो काँटों भरा बबूल हूँ


कहने को तो
काँटों भरा बबूल हूँ
कर्मों में
फूलों से अधिक महकता हूँ
मरुधर को हरयाली
राह चलते को छाँव देता हूँ
मनुष्य को गोंद
भेड़ बकरियों को भोजन
पक्षियों को विश्राम देता हूँ
न मरुधरा की
गर्म लू से घबराता हूँ
न सूर्य के 
ताप से डरता हूँ
सूख भी जाऊं तो
जलाने के काम आता हूँ
कहने को तो
काँटों भरा बबूल हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
402-13-04--07-2014
बबूल,कांटे,वृक्ष,प्रकृति,कर्म


समय के पटल पर

समय के पटल पर
ज़िंदगी कभी सीधी
कभी तिरछी चलती रही
तस्वीर बनती रही
बिगड़ती रही
कुछ मन माकिफ थी
कुछ बेमन की थी
मेरे हाथ में केवल
कर्म की कूंची थी
कभी ठीक चली
कभी भटक गयी
जब मन से चलाई
सुन्दर तस्वीर बनी
बेमन से चलाई
तस्वीर बिगड़ गयी
कभी मन से
चलाने पर भी
किस्मत आड़े आ गयी
साफ़ साफ़ समझा गयी
सब कुछ मेरे हाथ नहीं है
ईश्वर का साथ भी
ज़रूरी है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
401-12-04--07-2014

ज़िंदगी,कर्म,भाग्य,किस्मत,ईश्वर

दुखों का ढिंढोरा


ह्रदय को चैन 
मन को शान्ति नहीं
तो क्या दुखों का
ढिंढोरा पीटता रहूँ
ढिंढोरा पीटने से अगर
ह्रदय को चैन
मन को शान्ति मिल जाए
तो पीट भी लूं
पर आज तक न सुना
न देखा किसी को
रोने से सुख मिला हो
तो ही तो अनुसरण करूँ
अन्यथा क्यों नहीं
जैसे हँसते हँसते
लड़ता रहा हूँ
वैसे ही लड़ता रहूँ
©
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
400-11-04--07-2014

सुख,दुःख,जीवन,रोना धोना,ढिंढोरा पीटना,selected

Take life as it comes


Trample me
With your legs
Cut my head
 With the
Mowing machine
Sit on me
Play on me
Treat me
The way you want
I have never bothered
Shall never bother
I have lived without fear
Without bothering
About the pain
 Inflicted on me
I have remained green
Shall
Always remain green
May be
I am little grass
Growing in your garden
Still
I shall keep giving
 The message
To mankind
Take life as it comes
Never lose patience
Keep smiling
Live with courage
Never fail in duty
©
Dr.Rajendra Tela,Nirantar
Grass,courage,duty,patience,smile,life.

399-10-04--07-2014

गुरुवार, 3 जुलाई 2014

कहने को नन्ही दूब हूँ


निरंतर
अत्याचार सहती हूँ
पैरों तले रोंदी जाती हूँ
समय समय पर
काटी जाती हूँ
फिर भी हिम्मत से
जीती हूँ
ना घबराती हूँ
ना डरती हूँ
सदा हरी भरी रहती हूँ 
बगीचे की शोभा
बढ़ाती हूँ
कहने को नन्ही दूब हूँ
पर मनुष्य को भी
सीख देती हूँ
©
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
हिम्मत,जीवन,बगीचा,सीख,अत्याचार, दूब पर कविता

398-09-03--07-2014

हँसते चेहरे का दुःख


क्यों समझते हो
हँसते चेहरे को
कोई दुःख नहीं होता
होंसला बढ़ाने वाले का
होंसला कभी नहीं टूटता
जानना है तो
मेरे हृदय से पूछो
कैसे दुःख दबा कर
रखता है
मेरे मन से जानो
कैसे दर्द सहता है
मेरे तकिये से पूछो
आँखों की नमी
कैसे सहता है
मेरी चादर से पूछो
चेहरे की मायूसी
कैसे छुपाती है
मेरे बिस्तर से पूछो
कैसे रात भर
करवटें बदलता हूँ
मेरे आईने से पूछो
मेरा दर्द भरा चेहरा
कैसे बर्दाश्त करता है
क्यों समझते हो
हँसते चेहरे को
कोई दुःख नहीं होता
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
दुःख,सुख,जीवन,दर्द,

398-09-03--07-2014

Skirmish with sleep

One must sleep
At the time of sleep
The irony is
Most of us
Do not sleep
At the time of sleep
Even if we try to
Just cannot sleep
The reason is not
Known to many
People give
Different excuse
At different time
The truth is
Far away from
What they think
A restless mind
Is the true culprit
That keeps churning
Day and night
With or without
Any reason
All the times

©
Dr.Rajendra Tela,Nirantar.

Sleep,restless,restless mind

397-08-03--07-2014

Ray of Hope


Day after day
Dream after dream
Desire after desire
Ambition after ambition
Keep coming
Keep shattering
Man is so stubborn
 In his beliefs
 Has so much
Faith in hope
Does not stop
After every defeat
Sees another victory
Ray of hope
Never dies
©
Dr.Rajendra Tela,Nirantar.
Hope,faith,belief
396-07-03--07-2014

बुधवार, 2 जुलाई 2014

मेरी बातें मेरी ही नहीं होती हैं


मेरी बातें
मेरी ही नहीं होती हैं
कई यादें
साथ में जुडी होती है
कइयों की
बातें मिली होती हैं
कई घटनाओं की
छाप होती हैं
जो भुगता सहा
उसकी
अभिव्यक्ति होती है
मन के नेपथ्य में छुपी
बचपन से
जवानी तक की
हर बात होती है
कार्य कलापों की
छाया होती है
ह्रदय से निकली
सच्चाई होती है
मेरी बातें
मेरी ही नहीं होती
कई बातें
उनमें मिली होती हैं
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
यादें ,जीवन,अनुभव,बातें, घटनाएं ,selected
396-07-02--07-2014

एक सपना टूट गया तुम हार मानने लगे

एक सपना टूट गया 
तुम हार मानने लगे 
एक इच्छा पूरी नहीं हुई 
तुम आसूं बहाने लगे 
एक कदम चले नहीं 
तुम पीछे हटने लगे
जीवन एक कोषागार है 
आशाओं का सागर है
धैर्य उसका धन 
हिम्मत धरोहर है
तुम कोषागार के 
रखवाले  
धैर्य को संजोओ 
धरोहर को संवारों
कर्म के धन से 
कोषागार भरते रहो
निराशा के चोर
हताशा के डाकू 
अवसाद के लुटेरे से 
कोषागार बचाते रहो
जीवन चलने का 
दूसरा नाम 
बिना थके हारे 
निरंतर हँसते गाते 
चलते रहो 
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
जीवन,धैर्य,हिम्मत,कर्म,निराशा,हताशा,अवसाद,selected

395-06-02--07-2014

सफलता का अर्थ


तुम्हारी
सफलता का अर्थ
यह तो नहीं
स्वयं को श्रेष्ठ
दूसरों को
निर्बल समझने लगो
सफलता पर ख़ुशी
अवश्य प्रकट करो
पर सर पर ना चढ़ाओ
अहम से ना भर जाओ
सफलता असफलता
जीवन के अंश हैं
कब क्या मिलेगा
कर्म के साथ साथ
भाग्य पर भी निर्भर है
आज समय तुम्हारा है
कल दूसरे का होगा
इतना सा याद रख लो
आज तुम
लोगों पर हँस रहे हो
कल लोग तुम पर हँसेंगे

कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सफलता,असफलता,भाग्य, जीवन, अहम ,श्रेष्ठ, कर्म

394-05-02--07-2014

न चैन मिला ना चिंता घटी

भौतिक सुविधाओं की
चिंता में जीता रहा
इच्छाओं का दास
बना रहा
आत्मा को मारता रहा
चैन का भ्रम पालता रहा
सत्य से दूर जाता रहा
जीवन भर
व्यथित जीता रहा
न चैन मिला
ना चिंता घटी
खाली हाथ आया था
अंत तक
खाली हाथ रहा
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
चैन ,भ्रम, चिंता ,चाह,कामना,इच्छा जीवन,selected

393-04-02--07-2014

मंगलवार, 1 जुलाई 2014

चाह नहीं आकाश की ऊंचाइयां छूऊँ


चाह नहीं
आकाश की
ऊंचाइयां छूऊँ
चाह नहीं
समुद्र की
गहराइयाँ देखूं
चाह नहीं सत्ता की 
कुर्सी पर बैठूं
अखबार का
सुर्खियां बनूँ
चाह मन में
केवल एक ही बसी
शान्ति से जीऊँ
औरों के काम आऊं
रोता हुआ आया था
हँसता हुआ जाऊं
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
चाह,कामना,इच्छा जीवन,selected

392-03-01--07-2014

क्षमा का मलहम

ह्रदय खोल कर
तुम्हारे दिए
घाव दिखा भी दूं
तुम मीठे शब्दों से
लिपटा हुआ क्षमा का
मलहम लगा कर
घाव ठीक कर भी दो
तो भी उनके निशान
कैसे मिटा पाओगे
मन ने जो दुःख भोगा
उसकी भरपायी
कैसे कर पाओगे 
नेत्रों ने जो अश्रु बहाये
वो कैसे लौटाओगे
रातों को 
जो निद्रा खोयी
उस की पूर्ती कैसे करोगे
पहले ही
मन में प्रेम रखते
अहम् ईर्ष्या द्वेष से
नहीं जीते
आज आत्म ग्लानि से
विचलित नहीं होते
ना अब क्षमा का
मलहम लगाने की
आवश्यकता पड़ती
ना मन में
पश्चाताप की अग्नि
प्रज्वलित होती
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
क्षमा,पश्चाताप,ग्लानि,ईर्ष्या द्वेष,जीवन,selected
391-02-01--07-2014


सुख दुःख


क्या सुख
क्या दुःख
मनोस्थिति
ठीक नहीं हो
सुख दुःख में
बदल जाता है
दुःख सुख पर
हावी हो जाता है
चैन नेपथ्य में
छुप जाता है
आत्म मंथन करो
सार्थक सोच रखो
दुःख में भी सुख का
आभास होता है
चैन भी नेपथ्य से
निकल कर
मुंह दिखाता है
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सुख,दुःख, चैन,जीवन,selected

390-01-01--07-2014

सोमवार, 30 जून 2014

फूलों को तो सब चाहते हैं


फूलों को तो
सब चाहते हैं
हमें तो काटों से
मोहब्बत है
फूलों के साथ रहते हैं
उन्हें नापाक
नज़रों से बचाते हैं
उनसे ज्यादा
खुशकिस्मत कोई नहीं
फूलों की
सबसे ज्यादा खुशबू
वही सूंघते हैं
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,मोहब्बत,फूल,कांटे,खुशबू,selected

389-85-30--06-2014

कलम झूठ नहीं बोलती


दिल परेशान
मन व्यथित हो तो
कलम भी साथ
नहीं देती
मोहब्बत की बात
लिखना चाहता हूँ
ग़मों की कहानी
निकल जाती है
आज से पहले
पता ना था
दिल सच्चा
मन साफ़ हो तो 
कलम कभी
झूठ नहीं बोलती
ज़हन ना चाहे तो भी
कलम नहीं मानती
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

388-84-30--06-2014
शायरी,गम,परेशानी,कलम, झूठ,मन

रात खुश नहीं होती अँधेरे से


 रात
खुश नहीं होती
अँधेरे से
खुश होती है
जगमगाते
चाँद सितारों से
कब्रिस्तान की
मिट्टी खुश नहीं होती
किसी के दफ़न होने से
खुश होती है
ज़मीन में कुछ उगने से
कोई मनुष्य
खुश नहीं हो सकता
किसी मनुष्य की मौत से
वह मनुष्य
स्व्यं को मनुष्य
कैसे कह सकता है
जो किसी की जान लेकर
खुश होता हो
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
हत्या,जीवन,मृत्यु,जान लेना,

387-83-30--06-2014

मृत्यु पर कविता - नदी जब सूखने लगती है


नदी जब सूखने लगती है
किनारे टूटने लगते हैं
मिटटी तड़कने लगती है
जीव तड़पने लगते हैं 
कोई प्रिय जब 
जीवन से झूझ रहा हो
शय्या पर लाचार पड़ा हो
हृदय में दुःख की 
अग्नि धधकती है
मन में असहनीय 
दर्द की अनुभूति होती है
आत्मा अशांत हो जाती है
आँखों की नमी कम
होने का नाम नहीं लेती  
मृत्यु दरवाज़े पर
 खड़ी प्रतीत होती है
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,लाचार,मृत्यु,झूझना,हृदय,पीड़ा,दर्द
386-82-30--06-2014

रविवार, 29 जून 2014

पक्षी पर कविता- जल से गगन तक बसते हैं हम


धरा के एक छोर से
दूसरे छोर तक
जल से गगन तक
बसते हैं हम
छोटे तो इतने छोटे
हथेली में समा जाएँ
बड़े तो इतने बड़े
विशाल पंखों से
मनुष्य को
ढक सकते हैं हम
ना देश ना परदेस
सारे संसार को
अपना समझते हैं हम 
ना वस्त्राभूषण
ना पक्का घर
ना कोई रक्षक
भक्षक से बचकर
वनस्पति की
छाया में जीते हैं हम
ना शीत से घबराते
ना गर्मी से ड़रते हैं हम
रंग बिरंगे
सुन्दर सलोने
सुरीली आवाज़ से
लुभाते हैं हम

गगन में उड़ना हो
धरती पर चलना हो
जल में तैरना हो
हर विधा में निपुण हैं हम
हम पंछी जगत के
धरा से गगन तक
जल से पर्वत तक
बसते हैं हम

कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
पक्षी,पक्षियों,पंछी,पक्षियों पर कविता,पक्षी पर कविता

385-81-29--06-2014

धवल पंकज सी धवल प्रवत्ति


नदी जब सूखने लगती है
किनारे टूटने लगते हैं
मिटटी तड़कने लगती है
जीव तड़पने लगते हैं 
कोई प्रिय जब 
जीवन से झूझ रहा हो
शय्या पर लाचार पड़ा हो
हृदय में दुःख की 
अग्नि धधकती है
मन में असहनीय 
दर्द की अनुभूति होती है
आत्मा अशांत हो जाती है
आँखों की नमी कम
होने का नाम नहीं लेती  
मृत्यु दरवाज़े पर
 खड़ी प्रतीत होती है
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रवत्ति,सोच,जीवन,जीवन मन्त्र

384-80-29--06-2014

सपनों का मूक संसार


प्रेम
सम्बन्ध
समर्पण
मिलन
खिल उठता है
अनुभूतियों का
संसार
इश्वर इच्छा से
नए प्राणी का
सृजन होता
जीवन
मूर्त रूप लेता
नहीं तो
मूक हो जाता है
सपनों का
सुन्दर संसार
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सपने,सृजन,ईश्वर इच्छा,जीवन,selected

383-79-29--06-2014

किसी में सच्चाई किसी में ईमान ढूंढता रहा


किसी में सच्चाई
किसी में
ईमान ढूंढता रहा
किसी में हूनर
किसी में ज्ञान
खोजता रहा
हर दोस्त को
हर पल परखता रहा
खुद आईना देखना
भूलता रहा
जब तक पता चला
सर्व गुण संपन्न
कोई नहीं होता
अकेला रह गया था
हर दोस्त छोड़ कर
जा चुका था

कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,परखना,जीवन मन्त्र,दोस्त,दोस्ती ,selected

382-78-29--06-2014

ना जाने क्यों ज़िंदगी स्लेट नहीं किताब बन जाती है


ना जाने क्यों
ज़िंदगी स्लेट नहीं
किताब बन जाती है
एक बार लिख दिया
मिटाना चाहो तो
मिटा नहीं सकते
जितनी बार पढ़ो
उतनी बार
मन को झंझोड़ो
यादों में खो जाओ
हँसो रोओ
खुद से सवाल करो
खुद ही उत्तर दो
कितना अच्छा होता
अगर 
ज़िंदगी किताब नहीं
स्लेट बन जाती तो
जो मन में आये लिखो
अच्छा लगे तो
संजो कर रखो
अच्छा ना लगे
तो मिटा दो
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी,किताब,जीवन,स्लेट,selected

381-77-29--06-2014