ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 28 जून 2014

ना जाने क्यों कभी ?


ना जाने
क्यों कभी हृदय से
प्रश्न नहीं किया
क्यों इतना चंचल है
मन से नहीं पूछा
क्यों इच्छाओं का दास है
जुबान से नहीं जाना
क्यों इतनी वाचाल है
ना जाने क्यों कभी
परमात्मा से जानने की
प्रार्थना नहीं करी
क्यों मनुष्य का जीवन
स्वार्थ ईर्ष्या द्वेष
भ्रम से भरा हुआ है
क्यों मनुष्य
मनुष्य कहलाता है
पर मनुष्य बन कर
जीता नहीं
यह संभव ही नहीं
अपितु सत्य है
स्वयं रोग ग्रसित हूँ
इस कारण कभी
ध्यान आया ही नहीं

कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

380-76-28--06-2014

भ्रम,इच्छाएं,जीवन,हृदय,जुबान,मन,selected

शुक्रवार, 27 जून 2014

हंस कौवा हो गया है

सत्य पर भ्रम
विश्वास पर
अंधविश्वास
हावी हो गया
अब कौवा हंस
हंस कौवा हो गया है
विवेक
नेपथ्य में छुप गया है
लोगों की बुद्धि पर
बिना चाबी का
ताला पड़ गया है
चाहे जितना भी
प्रयत्न कर लो
खुल नहीं सकता
अब सपना
सच लगने लगा है
यथार्थ
ओझल हो गया है
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
379-75-27--06-2014

भ्रम,यथार्थ,जीवन,विवेक, सत्य ,विश्वास,अंधविश्वास

ख्वाहिशों का जाल


सुबह सूरज का
उजाला देखा
सूरज को पाने की
तमन्ना करने लगा
रात चाँद की
चांदनी को देखा
चाँद को पाने की
हसरतें रखने लगा
काम काज भूल कर
सपनों में खो गया
ना सूरज मिला
ना चाँद मिला
जिंदगी भर
ख्वाहिशों के 
जाल में
उलझा रहा
अंत तक
खाली हाथ रहा
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी,ख्वाहिश,तमन्ना,हसरत,शायरी,selected

378-74-27--06-2014

गुरुवार, 26 जून 2014

अंध विश्वास में


आदि अनादी काल से
चल रही हैं परम्पराएं
मानी जा रही हैं प्रथाएं
समर्थन पा रही है
मान्यताएं
न बुद्धि का प्रयोग
न विवेक का उपयोग
न प्रश्न करने वाला
न उत्तर देने वाला
न काल समय 
स्थिति
परिस्थिति का ध्यान
अंध विश्वास में
निरंतर
भीड़ से हाँ में हाँ
मिलाई जा रही है
आँख मीच कर
परम्पराएं
निभाई जा रही हैं

कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
377-73-26--06-2014
आस्था,परम्परा,प्रथा,जीवन,विश्वास,जीवन 

बुधवार, 25 जून 2014

अब रोने सहने को अकेली थी


शोर थमा
आँख उठा कर देखा
सब जा चुके थे
अब रोने सहने को
अकेली थी
लोगों ने हमदर्दी की
रस्म निभा दी थी
पति को याद कर के
ज़िन्दगी भर लड़ाई
उसे ही लड़नी थी
हर बेसहारा 
मासूम मज़बूर 
औरत की कहानी
अब उसे भी 
दोहरानी थी
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
376-72-25--06-2014

मज़बूर,नारी,स्त्री,औरत,सहना, बेसहारा ज़िन्दगी

कुंठाओं का वीभत्स संसार

जल थल आकाश
प्रकृति के भिन्न भिन्न
रंग रूपों से सजा हुआ है
भावनाओं संवेदनाओं
कुंठाओं के जाल में
जकड़े हुए
असंख्य जीवों से
भरा हुआ है
ईश्वर रचित संसार
इसी संसार में
निराशा,
ईर्ष्या द्वेष स्वार्थ
अहम् अहंकार के
आभूषणों से
अलंकृत
कुंठाओं का अपना
एक और
वीभत्स संसार है
जिनसे निकलना
असम्भव नहीं पर
दुरूह अवश्य होता है
मनुष्य
भावना रहित
शरीर से जीवित
पर संवेदनाओं से

मृत हो जाता है
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,कुंठा,संवेदना,भावना,संसार,
selected
375-71-25--06-2014


मंगलवार, 24 जून 2014

रखना था कलम का ध्यान स्याही के रंग में उलझ गए


 रखना था
कलम का ध्यान
स्याही के
रंग में उलझ गए
एक शब्द भी
ना लिख पाये
चलना था
कर्म के पथ पर
लक्ष्य की
चिंता में अटक गए
देखनी थी
व्यक्ति की खूबियां
बुराइयां ढूंढने में
व्यस्त हो गए
एक कदम भी
आगे ना बढ़ सके
दो कदम
पीछे चले गए
अर्थहीन
सोच के कारण

जीवन व्यर्थ कर बैठे
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
374-70-24--06-2014

Selected,कर्म,लक्ष्य,सोच,जीवन,जीवन मन्त्र 

बात हाँ ना कहने की नहीं


बात
हाँ ना कहने की नहीं
सिद्धांतों की होती है
सिद्धांतों से
मेल नहीं खाए
अपना हो या पराया
ना कहना ही पड़ता है
समझदार तो
समझ जाता है
नासमझ संबंधों पर
प्रश्न भी उठाता है
नासमझी का
प्रमाण भी दे देता है 
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
373-69-24--06-2014

सम्बन्ध,सिद्धांत,जीवन,हाँ ना कहना,समझदार, नासमझ,selected

बंद खिड़कियों के मकान


कुछ लोग
बंद खिड़कियों के
मकान जैसे होते हैं
जिसमें ना ताज़ी हवा
अंदर आ सकती है
ना बासी हवा
बाहर जा सकती है
कुंठित सोच से जीते हैं
स्वयं को अधिक
समझदार समझते हैं
अंदर ही अंदर
कुंठा की बासी हवा में
घुटते रहते हैं
सत्य के विपरीत
भ्रम में जीते हैं
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
372-68-24--06-2014

selected ,कुंठा,कुंठित,श्रेष्ठ,जीवन,समझदार

सोमवार, 23 जून 2014

तसल्ली


जिससे भी
मन की बात कही
उसी ने हँसी उडाई
मुझसे दोस्ती निभाई
अब खुद से भी
कुछ कहने की
हिम्मत नहीं होती
मन की बात
कागज़ के टुकड़े पर
लिख देता हूँ
पढ़ कर फाड़ देता हूँ
कह ना सका तो
लिख तो दी
मन की बात
मन में तो नहीं रही
सोच कर दिल को
तसल्ली देता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
कॉपीराइट@
371-67-23--06-2014

तसल्ली, शायरी,selected 

खौफ


मन तो बहुतों से
मिलने का करता है
दिल से दिल
मिलाने का करता है
पर दिल में ज़माने का
इतना खौफ बैठ गया
शक इस कदर
हावी हो गया
लोगों के ज़हन पर
अब अपनों से
मिलने में भी गुरेज़
करने लगा हूँ
तन्हाई में जीने लगा हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
कॉपीराइट@
शायरी,तन्हाई,शक,खौफ,

370-66-23--06-2014

उसे बेइमान कहना


उसका एक शब्द
तीर की तरह
हृदय में चुभ गया
मन को झंझोड़ गया
अहम् को जगा गया
संबंधों के हर सेतु को
ध्वस्त कर गया
प्रत्युत्तर में
मेरा उसे
बेइमान कहना
मेरे ईमान पर ही
सैकड़ों प्रश्न खडा
कर गया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
कॉपीराइट@
369-66-23--06-2014

सम्बन्ध,अहम,रिश्ते,जीवन, ईमान,selected 

मोहब्बत हमेशा डर के जीती है

मोहब्बत हमेशा
डर के जीती है
कोई छीन ना ले
किश्ती को मांझी से
दूर ना कर दे 
मंजिल को मुसाफिर से
कोई बहला 
फुसला ना ले
दिल को
हवस के लिए
हर लम्हा मोहब्बत
मन में 
सवाल उठाती है
लाख दुहाई दो
मानो ना मानो
मोहब्बत
ना सुकून से रहती है
ना रहने देती है
मोहब्बत हमेशा
डर के जीती है
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत,प्यार,प्रेम,सुकून,शायरी

368-65-23--06-2014

बिन बुलाया मेहमान

बिन बुलाये
मेहमान की तरह
भटकते भटकते
दुःख भी ना जाने
 कहाँ से आ जाते हैं
आते भी तो मन में
तांडव मचाते हैं
जीना ही
दूभर कर देते हैं
कितनी भी
मान मनुहार कर लो
जाने का
नाम ही नहीं लेते
ना जाने
किस की भड़ास
निकालते हैं
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
बिन बुलाया मेहमान,दुःख,जीवन ,भड़ास

367-64-23--06-2014

रविवार, 22 जून 2014

वक़्त के आगे भी वक़्त बहुत है


वक़्त के आगे भी
वक़्त बहुत है
न मैं रहूँगा ज़मीं पर
न मेरी बातें रहेगी
रह जायेंगी सिर्फ
मेरी कुछ यादें ज़मीं पर
ज़मीन की कुछ यादें
मेरे साथ चले जायेंगी
दोनों की यादें मिल कर
मुझे वहां
तुम्हें यहाँ रुलायेंगी
यादों का मंज़र
ज़मीं पर भी रहेगा
यादों का मंज़र
मेरे साथ भी जाएगा
हकीकत में न सही
दूर रह कर भी हम
यादों के ज़रिये 
मिलते रहेंगे
वक़्त के आगे भी
वक़्त बहुत है
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
वक़्त ,यादें,याद,selected
366-63-22--06-2014



शब्द भी कितने लचीले और सहनशील होते हैं


शब्द भी
कितने लचीले और
सहनशील होते हैं
जो जैसा भी चाहे
वैसे ही
तोड़ मरोड़ देता है
कवी लेखक
मन माफिक खेलते हैं
फिर भी चुपचाप
सहते रहते हैं
शब्द मगर
लाचार नहीं होते
उचित समय की
प्रतीक्षा करते हैं
मार तीर तलवार से
अधिक करते हैं
पल भर में
दोस्त को दुश्मन
दुश्मन को
दोस्त बना लेते हैं
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर


365-62-22--06-2014

लोगों ने राम सीता को नहीं छोड़ा


लोगों ने
राम सीता को 
नहीं छोड़ा
तुम्हें क्या छोड़ेंगे
ऊँगली उठाने की
आदत से
बाज नहीं आएंगे
तनाव
मुक्त रहने के लिए
खुद को ही
बलवान बनाना होगा
एक कान से सुन कर
दूसरे कान से
निकालना होगा
अविरल नदी सा
बहना होगा
निश्चिंत जीना होगा

कॉपीराइट@

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ऊँगली उठाना,लांछन,कहना सुनना,जीवन, तनाव

364-61-22--06-2014

क्योंकि मन को कतई विश्राम ना था


झांका जो
मन के अंदर
कोलाहल ही
कोलाहल भरा था
ईर्ष्या द्वेष का
साम्राज्य था
होड़ की जंग मची थी
अहंकार  का राज था
स्वार्थ का बोलाबाला
चैन कोसों दूर था
एक क्षण भी चैन नहीं   
क्योंकि मन को कतई  
विश्राम ना था
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
चैन,मन,कोलाहल,स्वार्थ,ईर्ष्या,द्वेष,अहंकार,जीवन 

362-59-22--06-2014