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शनिवार, 21 जून 2014

मन फिर भी रो रहा है


महका मौसम 
महकी फ़िज़ा है
पत्ता पत्ता बूटा बूटा
मस्ती में झूम रहा है
पक्षियों के कलरव
मादक संगीत बन कर
बह रहा है
भंवरों का गुंजन
हवाओं का बहना
फूलों का महकना
प्रेम अगन बढ़ा रहा है
मगर तेरे बिना
सब सूना लग रहा है
ह्रदय की पीड़ा
मन की
व्यथा बढ़ा रहा है
महका मौसम 
महकी फ़िज़ा है
मन फिर भी
रो रहा है
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्यार,मोहब्बत,मौसम,फ़िज़ा,विरह,
प्रेम,प्रेम अगन ,जुदाई
361-58-22--06-2014

मेरी बदहाली


ज़माने को छोडो
मेरी बदहाली का
आज कल हवा भी
मज़ाक उड़ाने लगी है
ज़ख्मों पर नमक
छिड़कने लगी हैं
घर की बंद
खिड़कियों से
आकर टकराती हैं
बामुश्किल आयी
नींद को उड़ाती हैं
ताज़ी हवा की
उम्मीद में
खिड़कियाँ खोलता हूँ
तो मुंह चिढ़ाते हुए
गुम हो जाती हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मज़ाक,मुंह चिढ़ाना,बदहाली,ज़िंदगी 

361-58-21--06-2014

मैंने कविताएं कहानियां नहीं पढ़ी


माना कि 
मैंने कविताएं
कहानियां नहीं पढ़ी 
यह भी माना कि 
मैंने कभी किताबें 
खोल कर भी नहीं देखी
यह भी सच है
मैंने स्कूल कॉलेज में
कदम भी नहीं रखा
पर यह भी सच है
मैंने लोगों को
समीप से देखा है
उनकी भावनाओं को
गहराई से समझा है
उनकी इच्छाओं
अनिच्छाओं पर
हृदय से नमन किया है
स्वयं दुखों को सहा है
लोगों का दुखों में
साथ निभाया है
उनकी खुशियों में
समिल्लित रहा हूँ
जीवन के हर रंग को
मनोभाव से देखा
समझा मैंने
हर संवेदना को 
स्वयं जिया मैंने
कुछ किताबें कहानियां
कविताएं पढ़ भी लेता
स्कूल कॉलेज में शिक्षा
ग्रहण भी कर लेता
पेट भरने के ज्ञान के
अलावा क्या पाता
मानवीय भावनाओं को
जाने समझे बिना
किताबी ज्ञान
अर्ध चन्द्रमा के
अर्ध उजाले के
समकक्ष होता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शिक्षा,ज्ञान,मानवीय भावनाएं,संवेदना,जीवन,जीवन मन्त्र

360-57-21--06-2014

शुक्रवार, 20 जून 2014

सार्थक सोच


लोग उम्र से नहीं 
सोच से बूढ़े होते हैं
सार्थक सोच रखने वाले 
सदा युवा रहते हैं
359-56-19--06-2014
जीवन मन्त्र श्रंखला-34
©डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
उम्र, सोच

गुरुवार, 19 जून 2014

बात केवल कहने की नहीं


बात केवल
कहने की नहीं
क्या कहना
कैसे कहना
जानने की होती है
सुनने वाले को
समझ आ जाए
तो सार्थक
नहीं आये तो
व्यर्थ होती है
समय की
बर्बादी के अलावा
कुछ नहीं होती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,जीवन मन्त्र,संवाद,कहना ,बात

359-56-19--06-2014

दिल मिले ना मिले

दिल मिले ना मिले मन मिलना ज़रूरी है
रिश्ते बने ना बने दोस्त बनाना ज़रूरी है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
दोस्त,दोस्ती,मन,

358-55-19--06-2014

बुधवार, 18 जून 2014

वो मंज़िल ही क्या जो आसानी से मिल जाए


वो समंदर ही क्या
जिस में लहरें न मचले
वो लहरें ही क्या
जो किनारे को ना छूएं
वो किनारा ही क्या
जिससे कोई किश्ती ना चले
वो किश्ती ही क्या
जो मंज़िल तक ना पहुंचे
वो मंज़िल ही क्या
जो आसानी से मिल जाए
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मंज़िल,लक्ष्य,कर्म ,समंदर,

357-54-18--06-2014

दोहरा चरित्र


आज तक
समझ नहीं पाया
मनुष्य का
दोहरा चरित्र क्यों है
बाल संवरे हुए
चेहरा पुता हुआ
कपडे सफ़ेद झक
फिर भी
दिल काला क्यों है
बातों में मिठास
व्यवहार में कुशल
फिर भी हरकतों में
छिछोरापन क्यों है
बड़ा मकान
घर में नौकर चाकर
भरपूर धन
ज़मीन जायदाद
फिर भी भ्रष्ट क्यों है
खुद का घर परिवार
पत्नी बच्चे
फिर भी महिलाओं पर
कुत्सित दृष्टि क्यों है
जनता की सरकार
अपनों का 
अपनों पर राज
आज तक स
मझ नहीं पाया
फिर भी
गरीब गरीब क्यों है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,दोहरा चरित्र ,
356-53-18--06-2014

उम्मीद


नाकामयाबियां
मुझे रुलाती नहीं हैं
दोस्तों की दुआएं
मुझे उम्मीद से
सरोबार रखती हैं

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
उम्मीद, नाकामयाबियां, दुआएं, शायरी

355-52-18--06-2014

ये कैसी ज़िंदगी है


ये कैसी ज़िंदगी है
अब सर छुपाने की
जगह भी नहीं बची है
अकेले में यादें
पीछा नहीं छोड़ती
लोगों के बीच सवाल
पीछा नहीं छोड़ते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी,शायरी,सवाल,यादें

354-51-18--06-2014

मंगलवार, 17 जून 2014

जब तक जानते नहीं


जब तक जानते नहीं
सब अच्छे लगते हैं
जानने के बाद
पैमाने बदल जाते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
पैमाने, पैमाना

353-50-17--06-2014

मन की गहराई में उतर जाती हैं आँखें



मन की गहराई में उत्तर जाती हैं आँखें
बिना कहे भी बहुत कुछ कह देती हैं आँखें 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
आँखें
352-49-17--06-2014

दोस्त


दोस्त की हर बात का अहसास दोस्त को होता है
ज़ख्म कई और होता है ,दर्द कहीं और होता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,दोस्त,दोस्ती,मित्र,मित्रता

350-47-17--06-2014

ख्वाहिश


ज़िंदगी में
कुछ मिले ना मिले
बस एक ही
ख्वाहिश बाकी है
कभी कोई ख्वाहिश
मन में जन्म ना ले 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

ख्वाहिश
349-46-17--06-2014

ईमानदार


स्वयं को
 पूर्ण ईमानदार कहने वाला
निश्चित रूप से बेईमान होता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ईमानदार,बेईमान

348-45-17--06-2014

सब्र की बात


दर्द की मार वही समझते हैं जिन्होंने गम सहे हैं
सब्र की बात वही करते हैं जिन्होंने गम देखे नहीं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
सब्र,दर्द,गम,शायरी

347-44-17--06-2014

इतना मुफ़लिस भी नहीं हूँ


इतना मुफ़लिस भी नहीं हूँ
किसी की तारीफ ही ना करूँ
इतना फ़िज़ूल खर्च भी नहीं
मन की दौलत यूँ ही लुटा दूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
मुफ़लिस,शायरी,तारीफ,

346-43-17--06-2014

रोज़ मिलने से


रोज़ मिलने से
अगर रिश्ते गहरे होते
पडोसी से रिश्ते
सब से अच्छे होते
रिश्ते उन्ही से गहरे होते
जो दूर रह कर भी
दिल में बसते
हर लम्हा याद आते
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
रिश्ते ,सम्बन्ध

345-42-17--06-2014

ना ज़माना खुद बदलता है

ना ज़माना खुद बदलता है
ना किसी को बदलने देता है
बदलने की नसीहत ज़रूर देता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
344-41-17--06-2014

नसीहत, ज़माना

सोमवार, 16 जून 2014

ये मुल्क न मेरा है न तेरा है


ये मुल्क न मेरा है
न तेरा है
हर शज़र हर गुल
हर नदी हर पहाड़
ये धरती ये आसमां
रामायण गीता
ग़ालिब की शायरी
कबीर के दोहे
यहाँ रहने वाले
हर बाशिंदे के हैं
न साथ लाये थे कुछ
न साथ ले जाओगे
यहां का यही पर
छोड़ जाओगे
फिर क्यों ये
तेरे मेरे का झगड़ा है
ये मुल्क न मेरा है
न तेरा है
यहाँ रहने वाले
हर बाशिंदे का हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मुल्क,देश,तेरा,मेरा,

343-41-16--06-2014

ह्रदय पर ताले


घरों के मानिंद  
लोग ह्रदय पर भी
ताले लगा कर
रखने लगे हैं
ह्रदय में भरा
प्रेम भण्डार
कोई चुरा नहीं ले
भय में प्रेम करना ही
भूल गए हैं
अब ना समझने वाले
ना समझाने वाले 
बचे हैं
जो समझाए
प्रेम बांटने से 
घटता नहीं
बढ़ता हैं
जितना बांटों
उतना ही फलता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रेम,प्यार,मोहब्बत,ज़िंदगी,जीवन,शायरी, ह्रदय

342-40-16--06-2014

तेरे सुर्ख होठों की शरारत मुझे याद है


तेरे सुर्ख होठों की
शरारत मुझे याद है
तेरी नीली आँखों की
गहराई मुझे याद है
तेरे अंदाज़ की
कशिश भी भूला नहीं हूँ
तेरी मीठी हंसी अब भी
कानों में गूंजती है
ये मेरी
बदकिस्मती ही तो है
मैं अब भी 
तेरा दीवाना हूँ
तुझे मेरा नाम तक
याद नहीं है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मोहब्बत,शायरी,याद,यादें
341-39-16--06-2014


जब तक निभ जाए तब तक रिश्ता


जब तक निभ जाए तब तक रिश्ता
----------
मुझे पता नहीं था
दो दीवारों के बीच भी
दीवारें होती हैं
रिश्तों में भी दरारें होती हैं
बचपन से युवा होने तक
सत्य से अवगत नहीं था
हर रिश्ते को पवित्र
समझता था
जब पहली बार
अखबार में पढ़ा
बेटे ने बाप को मार दिया
भाई ने भाई का
क़त्ल कर दिया
समझ गया हर रिश्ते का
अपना पैमाना होता है
अपनेपन से
अधिक स्वार्थ होता है
जब तक निभ जाए
तब तक रिश्ता
निभे नहीं तो दुश्मनी होता
खून अपना हो या पराया
कोई फर्क नहीं पड़ता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
रिश्ता,सम्बन्ध,अपना,पराया

340-38-16--06-2014

रविवार, 15 जून 2014

जब कह कर भी रोना है


जब कह कर भी रोना है
कर के भी सुनना है
फिर किसी को
क्या कहना
किसी से क्या सुनना है
क्या उम्मीद रखना है
तय कर लिया
अब सहना अधिक
कहना  कम है
रुलाये या सताए
हमें तो
हँसते हुए जीना है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

कहना,सहना,दुःख,जीवन,जीवन मन्त्र

339-37-15--06-2014

संबंधों का तोल मोल


क्यों सम्बन्धों को 
निरंतर तोलते हो
समय व्यर्थ करते हो
कौन निकट 
कौन दूर की चिंता में
डूबे रहते हो
सम्बन्धों को
सहजता से निभाते रहो
अपेक्षा रखना छोड़ दो
समय के अंतराल में
कौन निकट कौन दूर
पता चल जाएगा
प्रश्न का उत्तर मिल 
जाएगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सम्बन्ध,जीवन,रिश्ते,अपेक्षा,जीवन,जीवन मन्त्र,

338-36-15--06-2014