ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शुक्रवार, 6 जून 2014

उसूलों से बगावत


जब भी उसूलों से
बगावत करता हूँ
लगता है खुद से
दुश्मनी कर रहा हूँ
ज़माने से
बगावत करता हूँ
ज़माने का
दुश्मन बनता हूँ
जब दुश्मन ही
बनाने हैं
क्यों ना ज़माने को
दुश्मन बना लूँ
ज़माना तो
वैसे भी किसी का
साथ नहीं निभाता
चढ़ते को प्रणाम 
डूबते को डुबाता है
कम-स कम
उसूल तोड़ने से
तो बच जाऊंगा
खुद की नज़रों से भी
नहीं गिरूँगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
उसूल,सिद्धांत,जीवन,जीवन मन्त्र
319-16--06--06-2014


यादें भी कितनी चंचल होती हैं


पुराना
अखबार हाथ में आया
तारीख पढी
मन यादों में खो गया
चार आने का सिक्का
नज़र आया
बचपन आँखों में
घूम गया
दोस्तों के साथ
पुरानी तस्वीर हाथ लगी
कॉलेज के दिनों की
यादों में डूब गया
मन में ख्याल आया
यादें भी
कितनी चंचल होती हैं
मन को झंझोड़ने का
कोई अवसर
हाथ से नहीं जाने देती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
याद,यादें,जीवन,

318-15--06--06-2014

गुरुवार, 5 जून 2014

वर्किंग वुमन पर कविता -वर्किंग वुमन

वो काम करती है
सुबह से शाम
दौड़ती है
धन भी कमाती है
घर भी चलाती है
प्रताड़ित भी होती है
माँ भी है
पत्नी भी है
बहु भी है
भाभी भी है
चलती रहती है
करती रहती है
मन में रोती भी है
चुपचाप सुनती भी
सहती भी है
यह कोई पहेली नहीं
आज की
वर्किंग वुमन की
सच्ची कहानी है

 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
नारी,स्त्री,वर्किंग वुमन
317-14--05--06-2014


येन केन प्रकारेण


मुर्गे ने बांग लगाई
मैंने आँखें खोली
एक लम्बी उबासी
जोर की अंगड़ाई ली
विचारों की
नैया चल पडी
आज क्या करना है
चिंता में
भृकटी तन गयी
किससे मिलना
किस के घर जाना है
किस से बतियाना
किसे बताना है
किस से लेना
किसे देना है
क्या खाना
क्या पहनना है
सोच में उलझ गया
खिड़की के बाहर
तक ना झांका
इतना भी
ध्यान नहीं  किया 
आज मौसम
बहुत सुहावना है
ना सर्दी ना गर्मी
सूर्य भी नरम धूप
बिखेर रहा है
बगीचे में गुलाब का
नया फूल खिला है
मुंडेर पर बुलबुल का
जोड़ा बैठा है
मंदिर के घंटों की
सुरीली आवाज़
आ रही है
भौतिक दुनिया
की दिनचर्या में
इतना उलझता रहा
उसका दास बन गया
क्या प्रकृति
क्या सुन्दर पक्षी
क्या धर्म
सबसे मोह भंग
हो चुका था
धन अर्जन,
होड़ में जीना 
येन केन प्रकारेण  
साधन संपन्न होना
लक्ष्य बन चुका था

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रकृति,दिन चर्या,होड़,येन केन प्रकारे,जीवन,
316-13--05--06-2014


उसकी यादें


दरख्तों के साए भी
सूरज के उजाले के साथ
सुबह-ओ-शाम
छोटे बड़े होते रहते
पर उसकी यादें
ना बढ़ती ना कम होती
वैसे ही रुलाती रहती
सुबह होते ही
उसे भूलने की
उम्मीदें तो बढ़ती
मगर रात आते आते
उम्मीदें ख़त्म हो जाती
बेचैनी बढ़ती जाती  
अब रात भी रोज़ जैसे ही
नम आँखों में बीतेगी
ख्याल भर से ही मन की
घबराहट भी बढ़ जाती
ये जानते हुए भी वो
अब दुनिया में नहीं है
यादें कम होने का
नाम ही नहीं लेती
उसकी यादें
कभी दोस्त होती थी
उसके जाने के बाद वो भी
अब दुश्मन बन गयी हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
दरख़्त,साये,याद,यादें,मोहब्बत,शायरी
315-12--05--06-2014


बुधवार, 4 जून 2014

कर्म पथ


सफर लंबा
रास्ता काँटों भरा है
कदम कदम पर
तूफ़ान खड़ा है
मंज़िल तक पहुंचना है
तो हँसते गाते चलना है
निरंतर लड़ते रहना है
सब्र से जीना है
कर्म पथ से
कभी नहीं भटकना है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

314-11--04--06-2014
जीवन,जीवन मन्त्र, कर्म

जब क्रोधित होता हूँ


जब क्रोधित होता हूँ
विवेक खो देता हूँ
सोचने लगता हूँ
प्रतिष्ठा को
अहम् का प्रश्न बना दूं
वाद विवाद में उलझ जाऊं
द्वंद्व करने लगूं
मनों में दूरियां बढ़ा दूं
रिश्तों को
अस्त करने की ओर
कदम बढ़ा दूं
क्रोध शांत होने पर
जब विवेक से सोचता हूँ
तो पलट जाता हूँ
सोचने लगता हूँ
प्रतिष्ठा को
आत्म सम्मान से
नहीं जोडूँ
दुनिया के सामने
स्वयं को कमज़ोर दर्शाऊँ
हंसी का पात्र बन जाऊं
मगर रिश्तों को बना
कर रखूँ
आत्म बल का परिचय दूं
चुप रह कर बिना पैसे
चैन खरीद लूं

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
क्रोध, चैन ,अहम,विवेक,धैर्य,जीवन,जीवन मन्त्र
313-10--04--06-2014


मंगलवार, 3 जून 2014

समय के साथ बदल क्यों जाता हूँ


किसी के अंतिम संस्कार में
शमशान स्थल जाता हूँ
स्वयं को असहज पाता हूँ
शमशान वैराग्य में
डूब जाता हूँ
किसी विवाह समारोह में
जाता हूँ
खुशी में नाचने लगता हूँ
किसी गरीब को रोते देखता हूँ
रोने लगता हूँ
बम धमाके में लोगों के
मरने का समाचार सुनता हूँ
दहल जाता हूँ
किसी निशक्त से दुर्व्यवहार
होते देखता हूँ
क्रोध में उबलने लगता हूँ
सोचता हूँ इतना स्वार्थी
कैसे हो गया हूँ
समय के साथ बदल 
क्यों जाता हूँ
अवसर के बाद 
भूल क्यों जाता हूँ 
हर समय 
संवेदनशील हो कर
क्यों जी नहीं पाता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
समय,स्वार्थ,स्वार्थी,संवेदनशील,जीवन

312-09--03--06-2014

फूलों की आरज़ू में


फूलों की आरज़ू में
काँटों के
ज़ख्म भी मिलते हैं
मोहब्बत के सफ़र में
आँखों से अश्क़ भी 
बहते हैं
कामयाबी के सफ़र में
पैरों के तलवे भी 
छिलते हैं
ज़िंदगी के सफ़र में
कई गम सहने पड़ते हैं
हर हँसी के पीछे
कई दर्द छुपे होते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,ज़ख्म,मोहब्बत,कामयाबी

311-08--03--06-2014

सोमवार, 2 जून 2014

नटखट इच्छाएं


मन के आँगन में
इच्छाएं
नटखट बालक जैसे
निरंतर
धमा चौकड़ी मचाती 
मन को
कितना भी समझाओ
डांटो फटकारो
दो पल भी 
चुप नहीं बैठती
बेमन से 
हाँ भर भी ले तो
तो भी 
जिद पर अड़ जाती
पूरी हो ना हो
यथार्थ से दूर
आशाओं के संसार में
विचरण करती
ना चैन लेती
ना चैन लेने देती
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
नटखट ,इच्छाएं,चैन,धमा चौकड़ी

310-07--02--06-2014

आज का घर


ईट सीमेंट
कंक्रीट से बनी
चार दीवारों में
एक छत के नीचे
दो चार कमरे
हर कमरे में
कोई ना कोई रहता
अन्य रहने वालों के
साथ में
ना भोजन होता
ना चाय होती
एक दूसरे के
सामने पड़ जाते
कैसे हो
कह कर निकल लेते
सब अपने अपने 
बारे में
सोचते रहते
आज कल उसे घर
कहते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,आज कल ,घर,

309-06--02--06-2014

आइनों की हिम्मत


कभी कभी आइनों की
हिम्मत देख कर
इर्ष्या होने लगती है
गहराई से सोचता हूँ
ईर्ष्या सहानुभूति में
बदलती है
उनकी व्यथा को देख कर
व्यथित होता हूँ
सहनशक्ति को देख कर
उन्हें नमन करता हूँ
उनकी हिम्मत की
ह्रदय से
प्रशंसा करता  हूँ
झूठ को सच
दिखाते दिखाते भी
कभी थकते नहीं है
चेहरों का सच
जानने के बाद भी
कभी टूटते नहीं हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
आइना,हिम्मत,व्यथा,

308-05--02--06-2014

रविवार, 1 जून 2014

स्वार्थ की प्रार्थना


कोई पल पल
ज़िंदगी से झूझ रहा है
असीम पीड़ा से
करहा रहा है
आशा की किरण
ढूंढ रहा है
ईश्वर से प्रार्थना
कर रहा है
इस बार जान बक्श दे
जैसा तूं चाहता है
वही करूंगा
कोई ईश्वर से
धन दौलत मांग रहा है
भरी तिजोरी को
और भर दे
जो चाहेगा कर दूंगा
बड़ा मंदिर बनवा दूंगा
भूखे को रोटी
प्यासे को
पानी पिला दूंगा
कोई नहीं कहता
भगवान
आपने जो दिया
उसका धन्यवाद देता हूँ
मुझे नहीं उनको दे दो
जिन्हें मुझसे अधिक
आवश्यता है 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी ,ख्वाहिश,जीवन,इच्छा,स्वार्थ.ईश्वर,प्रार्थना
307-04--01--06-2014


ढीठ


पिट कर 
गर्म हुआ लोहा भी 
पिघल जाता है
तराशने से पत्थर भी
हीरा बन जाता है
सीखने से मनुष्य भी
हूनर मंद हो जाता है
ढीठ मनुष्य ही
ना सीखना चाहता है
ना पिट कर भी
सीखता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
306-03--01--06-2014

ढीठ ,जीवन

संबंधों का सेतु


हर दिन मिलो
महीनों में मिलो
सालों में मिलो
ना भी मिल पाओ तो
संपर्क बनाये रखो
चाहे चिट्ठी से बनाओ
फ़ोन से बनाओ
सन्देश भेज कर बनाओ
केवल मिलना ही
सम्बन्धो का सेतु नहीं है
सम्बन्ध निस्वार्थ हो
प्रेम से भरे हो
दूर रह कर भी
संपर्क बनाये रखने
से बने रहते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,सम्बन्ध,संपर्क,संबंधों का सेतु 


305-02--01--06-2014

मिथ्या प्रेम


मन चाहे ना चाहे
किसी की
प्रशंसा के उत्तर में 
प्रशंसा करना
किसी के निमंत्रण पर
उसे आमंत्रित करना
संबंधों को
बनाये रखने के लिए
ऐसे समीकरण
आवश्यक हैं 
ऐसा सोच ही 
संबंधों को
टूटने का कारण है
मिथ्या प्रेम के
ध्वस्त होने का 
सबसे बड़ा सत्य है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
304-01--01--06-2014
मिथ्या प्रेम, समीकरण, सम्बन्ध,जीवन