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शनिवार, 31 मई 2014

आशाओं की खुशी


हर सुबह एक नया
सपना देखता हूँ
दिन भर आशा में
खुश रहता हूँ
रात भर सपनों की
दुनिया में विचरता हूँ
सुबह होते होते
यथार्थ के संसार में
लौट जाता हूँ
आदत से बाध्य हो कर
फिर एक नया सपना
देखने लगता हूँ
दिन आशाओं की
खुशी में गुजारता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सपना,आशा,आशाएं,जीवन

303-70--31--05-2014

हर स्थिति में


बुढापे के सफ़ेद बाल
चेहरे पर झुर्रियां
माथे पर चिंता की लकीरें देख
मेरे कमरे में लगा
आइना व्यथित होने लगता है
नम आँखें लिए पूछता है
कहाँ खो गया
तुम्हारा पहले सा बेफिक्र अंदाज़
क्यों नहीं रहा अब तुम्हारा
पहले सा बन ठन कर रहना
किस चिंता में घुलते रहते हो
क्यों चेहरे की झुर्रियों और
सफ़ेद बालों में जीवन का
अंत देखते हो
मेरी ओर भी तो देखो
तुम्हारी जितनी ही उम्र का हूँ
अब भी पहले जैसे ही
तुम्हारी सूरत दिखाता हूँ
जब तक तड़क नहीं जाऊंगा
खुशी से जीता रहूँगा
हर स्थिति में
जीवन आनंद लेता रहूँगा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर,अजमेर
बुढ़ापा,वृद्धावस्था,जीवन,जीवन मन्त्र,आनंद

302-69--31--05-2014

मूक रह कर


वृक्ष पर लगा पत्ता
हरे से पीला हुआ
इक दिन डाल से
टूट कर
लहराता हुआ
धरती पर आ गया
हवा का झोंका
उसे उड़ा कर वृक्ष से
कहीं दूर ले गया
वृक्ष ने ना क्रंदन किया
ना दुःख मनाया
मूक रह कर पत्ते का
विछोह सहता रहा
जीवन के नियम का
पालन करता रहा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
विछोह,जीवन,क्रंदन,

301-68--31--05-2014

शुक्रवार, 30 मई 2014

मार्गदर्शन


मन प्रसन्न नहीं अगर 
हृदय व्यथाओं का घर
सर पर चिंता सवार
धैर्य लुप्त हो जाता है
क्रोध जन्म लेता है
सोच भटक जाता है
कदम लड़खड़ाता है
एकाग्रता भंग
लक्ष्य दूर जाता है
निराशा का
जन्म होता है
चारों ओर अँधेरा
दिखाई देता है
कंधे पर एक हाथ
धैर्य बंधाता है
स्नेह का एक वाक्य
हिम्मत बढ़ाता है
उचित मार्गदर्शन
निराशा को
आशा में बदलता है
पथ पर लौटाता है
कंटकाकीर्ण जीवन
सरल हो जाता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,जीवन मन्त्र संवेदना,हिम्मत,मार्गदर्शन,धैर्य,निराशा,व्यथा

2300-67--31--05-2014

अश्क़ों के कुछ कतरे उधार दे दो

मेरी आँखों के
अश्क़ तो सूख चुके हैं
तुम्हारे अश्क़ों के
कुछ कतरे उधार दे दो
अपने कुछ कम कर लो
लौटा तो नहीं पाऊंगा
तुम्हारे ग़मों के खातिर
तुम्हारी जगह मैं बहा दूंगा
मुझे तो आदत है
अश्क़ बहाने की
कम-से-कम
तुम्हें तो दर्द से बचा लूंगा
खुद का दर्द तो कभी
कम नहीं कर सका
तुम्हारा दर्द तो
कम कर ही दूंगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,अश्क़,गम,दर्द

299-66--30--05-2014

ये हवाएं भी कितनी निराली होती हैं


ये हवाएं भी कितनी
निराली होती हैं
कभी नर्तकी सी 
थिरकती हैं
मस्ती में झूमती,
लहकती हैं
हँसती,मुस्काराती हैं
कभी मद में बहकती हैं
कभी आंधियां बन 
फुफकारती हैं
क्रोध अभिव्यक्त करती हैं
कभी शान्ति से 
मंद मंद बहती हैं
प्रेम अनुभूति कराती हैं
कभी सांय सांय कर
डराती हैं
कभी बालक सी 
मचलती हैं
कभी नव नवेली
दुल्हन सी लरजती हैं
कभी थम कर खिन्नता का
आभास कराती हैं
कभी बर्फीले पहाड़ों से
टकराकर कंपकंपाती हैं
कभी लू बन कर 
झुलसाती हैं
ये हवाएं भी कितनी
निराली होती हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
हवा,हवाएं,पवन,वायु,प्रकृति

298-65--30--05-2014

स्वार्थी नहीं हूँ


प्रकृति ने
क्षितिज से पूछा
तुम चाँद सूरज को
ह्रदय से चाहते हो
उन्हें नित्य अपने
दामन में छुपाते हो
फिर क्यों
थोड़े समय पश्चात ही
उन्हें संसार में
अवतरित करते हो 
मुस्काराते हुए
क्षितिज कहने लगा
मैं चाँद सूरज दोनों से
प्रेम अवश्य करता हूँ
पर स्वार्थी नहीं हूँ
उन्हें सदा के लिए
अपने दामन में छुपा कर
संसार को अँधेरे में नहीं
धकलने चाहता हूँ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
स्वार्थ,जीवन,प्रकृति ,क्षितिज,स्वार्थी 

297-64--30--05-2014

बादल और इंसान


कभी सोचता हूँ
तो बादलों और इंसान में
कोई फर्क नहीं पाता हूँ
क्रोध में बादल भी
इंसानों जैसे ही गरजते हैं
नफरत की
बिजलियाँ गिराते हैं
जी भर कर बरसते हैं
मौत का तांडव मचाते हैं
नदी नाली उफनने लगते हैं
गरीबों के झोंपड़ों और पेड़
पौधों को तहस नहस करते हैं
जब खुश होते हैं तो
आकाश में रुई के फाहे से
मस्ती में बहकते हैं
रिम झिम बौछारों से
मन को मोहते हैं
गम के हालात में बारिश
बन कर आसूं बहाते हैं
जी भर कर धरती को
भिगोते हैं
कभी सोचता हूँ
तो बादलों और इंसानों में
कोई फर्क नहीं पाता हूँ.....
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
बादल,इंसान,जीवन

296-63--30--05-2014

भाग्यशाली


मेरे जितना
भाग्यशाली कौन होगा
जीवन में जो भी मिला
उसने कुछ ना कुछ दिया
किसी ने प्रेम दिया
किसी ने ईर्ष्या द्वेष दिया
मैंने सदा लोगों से पाया
कभी खोया नहीं
प्रेम ने ईर्ष्या द्वेष से
दूर रहना सिखाया
ईर्ष्या द्वेष ने
प्रेम करना सिखाया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
संवेदना, कष्ट, पीड़ा, सांत्वना, जीवन,भाग्यशाली

281-48--26--05-2014

कितना सुन्दर द्रश्य था


कितना
सुन्दर द्रश्य था
जब नभ की
थाह लेने के लिए
 चिड़िया ने पहली बार
पंख फैलाए थे
ह्रदय उल्लास से
उछलने लगा था
कितना सुन्दर द्रश्य था
जब जीवन यात्रा पर
चलने के लिए
नन्हे बालक ने पहली बार
कदम बढाए थे
मन आशाओं से भर गया था
कितना सुन्दर द्रश्य था
जब नन्ही कली ने
बगिया को महकाने के लिए
अपने चक्षु खोले थे 
ह्रदय में भावनाओं का
सागर उमड़ा था
कितना सुन्दर द्रश्य था
जब विशाल वृक्ष
बनने की राह में
नन्हा बीज 
पल्लवित हुआ था
मन विश्वास से 
भर गया था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
295-62--30--05-2014
उल्लास,सुन्दर दृश्य ,भावनाएं,जीवन,ख़ुशी,संवेदना


गुरुवार, 29 मई 2014

साक्षी


आसानी से
कह दिया तुमने
तुम साक्षी हो
मेरे दुखों के
क्या कहा किसी ने
क्या करा किसी ने
उसके साक्षी तो
और भी मिल जाएंगे 
मन में क्या हुआ
हृदय कितना तड़पा
उसका साक्षी
कहाँ से लाऊँ
अकेले में
जितने आसूं बहाए 
उनका साक्षी
कहाँ से लाऊँ
कितना सहा
कितनी 
रातों को जागा   
उसका साक्षी
किसे बनाऊं
आसान होता है
कहना
एक दिन सब
ठीक हो जाएगा
जो वक़्त रोने में
गुजर गया
उसका साक्षी
कहाँ से लाऊँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
साक्षी, जीवन, दुख

294-61--29--05-2014

हवाएँ नहीं कहती मेरे साथ चलो


हवाएँ नहीं कहती
मेरे साथ चलो
नदी नहीं कहती
मेरे साथ बहो
पक्षी नहीं कहते
गगन में साथ उडो
ना सूरज चाँद
कहते हैं
हमारे जैसे चमको
ना जाने फिर मनुष्य
क्यों चाहता है
जैसा वो चाहे
सब वैसा ही करें
जो उसे अच्छा लगे
सबको वही अच्छा लगे
जैसे वो सोचे
सब वैसे ही सोचें

डा.राजेंद्र तेला"निरंतर",
293-60--29--05-2014

जीवन,सोच,जीवन मन्त्र,मनुष्य  

मनोयोग से


अस्त होते सूर्य ने
उगते सूर्य से पूछा
क्यों खुशी में दमक रहे हो
तीव्रता से चमक रहे हो
पूर्ण वेग से रश्मियाँ
बिखेर रहे हो
मेरे जैसे ही एक दिन
तुम्हें भी मंद पढ़ना होगा
क्षितिज के आँचल में
समाना होगा
खुशियों को नियंत्रित करो
कुछ ऊर्जा बचा कर रखो
उगता सूर्य बोला
आपकी बात समझता हूँ
जीवन की नियति जानता हूँ
आपके जैसे ही मुझे भी
एक दिन अस्त होना होगा
इसलिए जी भर कर
चमक रहा हूँ
फिर अवसर मिले ना मिले
पूर्ण मनोयोग से
रश्मियाँ बिखेर रहा हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,जीवन मन्त्र,नियति,सूर्य, मनोयोग से

292-59--29--05-2014

जी चाहता चाँद से थोड़ी सी चांदनी चुरा लूं


जी चाहता 
चाँद से थोड़ी सी 
चांदनी चुरा लूं
थोड़ी अपने पास रख लूं
बाकी दुनिया में बाँट दूं
दिलों को रोशन कर दूं
जहन से अन्धेरा मिटा दूं
मोहब्बत के ज़ज्बे से 
लबरेज़ कर दूं
हर चेहरे को
खुशी से भर दूं
खुद को सुकून दे दूं
जी चाहता 
चाँद से थोड़ी सी 
चांदनी चुरा लूं
डा. राजेंद्र  तेला ,निरंतर
प्यार,मोहब्बत,ज़िंदगी,जीवन,चाँद,चांदनी 
291-58--29--05-2014


कटी पतंग


ज़िंदगी 
बिजली के  
तारों में अटकी
कटी पतंग सी 
हो गयी है
हवा के झोंकों में
फड़फड़ा रही है
ना नीचे आ रही है
ना हवा में उड़ रही है
तुम मेरी चिंता में
दुबले हो रहे हो
मैं तुम्हारी चिंता में
दुबला हो रहा हूँ
नतीजा कुछ नहीं
निकल रहा है
तुम भी आगे नहीं
बढ़ पा रहे हो
मैं भी ठिठक कर
खड़ा हुआ हूँ
ज़िंदगी की पतंग को
हवा में उड़ाना है
तो टूटे रिश्तों को
जोड़ना होगा
हँस कर जीना होगा
चिंता मुक्त रहना होगा
सहनशीलता को
अपनाना होगा
ईर्ष्या द्वेष को
छोड़ना होगा
जो बस में नहीं
उसे भूलना होगा
कर्म को
उद्देश्य बनाना होगा
भाग्य से अधिक
कर्म पर विश्वास
रखना होगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,जीवन मन्त्र,कर्म,सहनशीलता,ईर्ष्या द्वेष
290-57--29--05-2014


बुधवार, 28 मई 2014

पहली बारिश


ख़त में
वादा किया था
पहली बारिश में मुझसे
पहली मुलाक़ात करेगी
पहली बारिश भी आयी
मैं इंतज़ार करता रहा
वो बेफिक्र सोती रही
ख़्वाबों की दुनिया में
खोती रही
जब तक उसकी नींद उडी
बारिश थम चुकी थी
चटक धूप खिल चुकी थी
मेरी मिलने की ख्वाहिश
कम हो चुकी थी
आँखें भी थक चुकी थी
नींद की गोद में जाने की
जिद करने लगी थी
उसकी ख्वाहिश
जाग चुकी थी
जब तक वो आयी
मैं जा चुका था
हर बार यूँ ही होता था
हमारी ख्वाहिशों का
वक़्त जुदा होता था
ना मुलाक़ात होती थी
ना हसरतें परवान 
चढ़ती थी
पहली बारिश ही
आख़िरी 
बारिश होती थी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
बारिश,मोहब्बत,प्रेम,ख्वाहिश

289-56--28--05-2014

हास्य कविता -हँसमुखजी बोले मुझसे


हँसमुखजी बोले मुझसे
भाई निरंतर आज कुछ
लिखने का मन नहीं हो रहा
मैं बोला लिखने का
मन नहीं हो रहा
तो कुछ पढ़ लो
हँसमुखजी बोले पढने का
मन भी नहीं हो रहा
मैं बोला
तो टी.वी.पर कुछ देख लो
हँसमुखजी बोले
टी.वी.देखने का मन भी
नहीं हो रहा
मैं बोला
टी.वी.देखने का
मन भी नहीं हो रहा
तो संगीत ही सुन लो
हँसमुखजी बोले
संगीत सुनने का मन भी
नहीं हो रहा है
परेशान मन से
मैं बोला
कुछ भी कर लो पर
मेरा दिमाग मत खाओ
हँसमुखजी बोले
कैसे बात करते हो
क्यों नाराज़ होते हो
दिमाग खाने का मन है
वही कर भी रहा हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर,
हास्य,हँसी,हँसमुखजी,हास्य व्यंग्य, हास्य कविता

288-55--28--05-2014

आस्था के महासागर में


आस्था के
महासागर में
डुबकी लगा लो
कभी गंगा कभी 
पुष्कर में नहा लो
बद्रीनाथ
महाकाल के
दर्शन कर लो
चाहे रामायण
गीता पढ़ लो
मंदिर
 गुरुद्वारे में
मत्था टेक लो
सद्कर्मों से
दूर रह कर
भ्रम में जीते रहो
ना राम मिलेगा
ना कृष्ण मिलेगा 
जीवन अधूरा रहेगा 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर,अजमेर
राम,कृष्ण,सद कर्म,भ्रम,आस्था,गंगा,पुष्कर,जीवन 

287-54--28--05-2014

मंगलवार, 27 मई 2014

अनाडी


अनाडी
सफल नाविक नहीं
हो सकता 
कभी 
बढ़ चढ़ कर बोलने से
रास्ता पार नहीं 

होता कभी 
जो पतवार नहीं
सम्हाल सकता 

नदी के पार 
नहीं पहुंचता कभी
जो भ्रम में जीता 

मझधार में 
डूब जाता एक दिन 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
अनाडी ,भ्रम,जीवन,बढ़ चढ़ कर बोलना

286-53--27--05-2014

हर शख्श सिर्फ ख्वाहिशों का गुलाम है


 ज़िन्दगी के
सफ़र का अंत
जब कब्रिस्तान है
ना जाने फिर
क्यों सब परेशान हैं
छ गज ज़मीन के
खातिर
हर पल घमासान है
ना पहले समझना
चाहता था कोई
ना अब समझना
चाहता है कोई
जानते हुए भी
हर शख्श सिर्फ
ख्वाहिशों का गुलाम है
जान कर भी अनजान है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
गुलाम.ज़िंदगी,ख्वाहिश ,ख्वाहिशें,

285-52--27--05-2014

चैन की खोज में


जीवन भर चैन की
खोज में भटकता रहा
ढूँढता रहा
मित्रों में धन दौलत में
परिवार में रिश्तों में
प्रेम में आसक्ति में
स्नेह में सम्मान में
आडम्बर में दिखावे में
भौतिक साधनों में
खान पान में
आशाओं में अहंकार में
अहम् में ईर्ष्या द्वेष में
कर्म में उपलब्धियों में
मोहल्ले में शहर में
देश में विदेश में
चैन सदा दूर ही रहा
मन चैतन्य हुआ
आत्मा की आँख खुली
तो पता चला
सोच पर पर्दा पड़ा था
कुंठाओं में जी रहा था
चैन मन में छुपा था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
चैन,जीवन,बेचैनी ,संतुष्टि
जीवन मन्त्र,
कुंठा

284-51--27--05-2014

प्रश्नों का उत्तर


हर दिन
मन सोचता भी है
चाहता भी है
फिर भी
कुछ प्रश्नों का उत्तर
जीवन भर नहीं मिलता
एक का
मिल भी जाए तो
चार खड़े हो जाते
प्रभु ने आशा का
ऐसा प्रलोभन
बसाया मन में
उत्तर नहीं
मिलने पर भी
मन विद्रोह नहीं करता
सोचते सोचते
मनुष्य चलता रहता
जो हार जाता
सोचना छोड़ देता
उत्तर की प्रतीक्षा में
स्वयं ही जीवन हर लेता 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रश्न,उत्तर,जीवन,आशा,प्रलोभन

283-50--27--05-2014

वियोग की आह


वृक्षों के झुरमुट में
झूमते पत्तों के बीच
सूर्य किरणों सी
झलक दिखा कर
छुप जाती हो तुम
हृदय के शांत समुद्र में
मचलती लहरों सी
हलचल मचाती हो तुम
बुझी हुयी भावनाओं को
प्रज्वलित करती हो तुम
कभी खुले आकाश में
चमकते सूर्य सी 
क्यों नहीं चमकती हो तुम
प्रेम की मचलती लहरों को
किनारे नहीं लगाती हो तुम
निरंतर तड़पाती हो तुम
पल पल रुलाती हो तुम
पल पल रुलाती हो तुम
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
प्रेम,भावनाएं,तड़प,  
282-49--27--05-2014

    

सोमवार, 26 मई 2014

संवेदना के कर्तव्य की इतिश्री


कोई मन बता दो
जिसे कोई दुःख नहीं है
कोई शरीर बता दो
जिसे कोई रोग नहीं है
क्यों फिर लोगों के
दुःख में
पीड़ा में रोग में
सम्मिलित नहीं होते
उनके कष्ट को
अपना कष्ट नहीं समझते
केवल सांत्वना के
शब्दों से
संवेदना के कर्तव्य की
इतिश्री करते हो
जब तक दुःख
कम नहीं कर सकते
सारी संवेदनाएं व्यर्थ हैं
अपने दुःख में लोगों का
सम्मिलित होने का
सोच भी व्यर्थ है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
 संवेदना, कष्ट, पीड़ा, सांत्वना, जीवन

281-48--26--05-2014


विछोह का अन्धकार


कोई मन में उतरा
कोई हृदय में उतरा
अंतस में प्रेम
पल्ल्वित हुआ
महक से भरा
बसा रहा तब तक
जीवन उज्जवल रहा
जाते ही
विछोह का
अन्धकार छा गया
जीवन
सत्य पता चल गया  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
अंतस,प्रेम,जीवन,विछोह

280-47--26--05-2014