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शनिवार, 24 मई 2014

आज भी चल रहा हूँ कल भी चलता रहूँगा


ना आज को
कोसता हूँ
ना कल को
याद कर रोता हूँ
कल क्या करना है
सोचता हूँ
ना होड़ में जीता हूँ
ना सपने देखता हूँ
पुरुषार्थ पर
विश्वास रखता हूँ
हार में
निराश नहीं होता हूँ
त्रुटियों से सीखता हूँ
निरंतर कर्म पथ पर
चलता रहा हूँ
आज भी चल रहा हूँ
कल भी चलता रहूँगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
275-42--24--05-2014
जीवन.जीवन मन्त्र,कर्म,पुरुषार्थ

मुझे संतुष्टि है


मुझे ग्लानि नहीं
जीवन में तुमसे
देर से मिलना हुआ
जानता हूँ
अच्छा भाग्य भी
समय से ही मिलता है
मुझे संतुष्टि है
वर्षों से जो ढूंढ रहा था
अंत में वह प्रेम
मुझे मिल ही गया
लोगों को जो
जीवन भर नहीं मिलता
मुझे जीवित रहते ही
मिल गया
आत्मा का मोक्ष पथ
मुझे मिल गया
मन के चैन
हृदय की शांति के लिए
ईश्वर से इससे अधिक
मिल ही नहीं सकता था

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,मोक्ष,मोक्ष पथ ,प्रेम,संतुष्टि

274-41--24--05-2014

इच्छाओं का प्रतिबिम्ब


दिन प्रतीक्षा में कटा
रात करवटों में बीती
न कोई सन्देश आया
न ही वो आयी
रात भर संशय की
स्थिति बनी रही
हृदय से 
शुभ कामनाओं की
प्रार्थना निकलती रही
सुबह स्थिति सामान्य हुई
हर दिन यही बात थी
न किसी को आना था
न किसी की प्रतीक्षा थी
सारी बातें भावुक
मन की उपज थी
दबी इच्छाओं का
प्रतिबिम्ब थी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर 
सपना,ख्वाब,इच्छा,प्रतिबिम्ब

273-40--24--05-2014

शुक्रवार, 23 मई 2014

पहरा


लोग मेरी
चाहतों पर भी
पहरा लगाना चाहते हैं
मेरे जज़्बातों को
बाँधना चाहते हैं
कैसे समझाऊँ
उन नादानों को
बहती हवाओं
बहते पानी को
कोई नहीं रोक सकता
मोहब्बत से
लबरेज़ दिल को
कोई खामोश नहीं
रख सकता
कोई तंगदिल ही
ऐसा कर सकता है 
 डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
272-39--23--05-2014

चाहत ,ज़ज़्बात,मोहब्बत,तंगदिल,शायरी

गुरुवार, 22 मई 2014

सुबह से शाम हो गयी वो चिड़िया नहीं आयी


सुबह से शाम हो गयी
वो चिड़िया नहीं आयी
अकेलेपन को
मधुर आवाज़ से
भरनेवाली वो चिड़िया
आज क्यों नहीं आयी
मन में उठते
प्रश्नों के ज्वार भाटे को
विराम नहीं
हृदय में संशय की
आंधी को ठहराव नहीं
क्या चिड़िया भी
सांसारिक हो गयी
मुझे छोड़ किसी
दूसरे घर में बस गयी
मन की उथल पुथल
रात भर चलती रही
सुबह घर की घंटी बज़ी
आधी नींद से आँख खुली
दरवाज़ा खोला
सामने दूधवाला खड़ा था
मुझे देखते ही बोला
लगता है
आपकी चहेती चिड़िया
बिल्ली का शिकार हो गयी
दृष्टि घुमाई
दरवाज़े के बगल में
अधखायी चिड़िया
निर्जीव पडी थी
मरते मरते सन्देश दे गयी
जान दे सकती है पर
विश्वासघात
नहीं कर सकती 

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
विश्वासघात 

271-38--22--05-2014

जहां था वहीं का वहीं खडा रह गया


ज़िन्दगी भर
उम्मीदों की
बारिश में भीगता रहा
ख्वाहिशों के
मुकम्मल होने का
इंतज़ार करता रहा
उम्मीदों की
बारिश रुकी नहीं
ख्वाहिशें भी कभी
पूरी हुई नहीं
मैं जहां था
वहीं का वहीं
खडा रह गया
नाकामयाबियों पर
दूसरों को दोष देता रहा
साथ में चलने वाला
हर मुसाफिर आगे
बढ़ गया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी,दोषारोपण,नाकामयाबी, ख्वाहिशें
उम्मीद

270-37--22--05-2014

रिश्ते


कुछ रिश्ते
विरासत में मिलते
कुछ मन से
कुछ बेमन से ढोये जाते
कुछ रिश्ते मज़बूरी में बनते
सदा आधे अधूरे रहते
कुछ रिश्ते हृदय से बनते
हृदय मिलते
तब तक बने रहते
कुछ रिश्ते मन से बनते
स्वार्थ के आगमन तक
निभते रहते
जो रिश्ते मन और हृदय के
सामंजस्य से बनते
ईर्ष्या द्वेष स्वार्थ से परे 
धैर्य से परिपूर्ण होते
जन्म जन्मान्तर बने रहते
एक दूसरे के पूरक होते
डा.राजेंद्र तेला ,निरंतर
रिश्ते, सम्बन्ध,जीवन,रिश्ता

269-36--21--05-2014

बुधवार, 21 मई 2014

निर्णय आधार


एक समय था
जब बहुत सोचता था
खुद के पैरों पर
खुद कुल्हाड़ी मारता था 
विचारों के
भंवर में उलझता था
कुंठाओं को
आमंत्रण देता था
स्पष्टता को
क्लिष्टता में बदलता था
जब से विवेक को
निर्णय आधार बनाया
ना कुंठा रही
ना चैन खोया
जीने का आनंद आने लगा
जीवन दुर्गम पथ से
सहज पथ पर चलने लगा

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,जीवन मन्त्र,कुंठा, अनिर्णय,सोच विवेक,

268-35--21--05-2014

कल रात सपने में जब ईश्वर मिला मुझ से


कल रात सपने में
जब ईश्वर मिला मुझ से  
व्यथित देख कर
बोला मुझ से
व्यथा मुक्त रहना हो तो 
मेरा कहा मान लो
उन आँखों से देखो
जिनसे कोई
छोटा बड़ा नहीं दिखता
उस सोच से सोचो
जिसमें कोई
अच्छा बुरा नहीं होता
उस हृदय से जीओ
जिस में ईर्ष्या का
कण मात्र भी नहीं होता
उस मन को सहेजो
जिसमें धैर्य का राज होता
उस विवेक पर विश्वास रखो
जिसमें स्वार्थ का
कोई स्थान नहीं होता
होड़ से बच कर रहो
प्रेम को लक्ष्य बनाओं
व्यथा मुक्त जीने का
केवल यही उपाय होता
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर  
जीवन,जीवन मन्त्र,प्रेम,धैर्य, विवेक, स्वार्थ, होड़

267-34--21--05-2014

जब तक चलता सिक्का हूँ



जब तक चलता सिक्का हूँ
============
अच्छा करूँ 
बुरा करूँ
स्वच्छ रहूँ 
अस्वच्छ रहूँ
प्यार करूँ 
नफरत करूँ
हँसाऊँ या रुलाऊँ
जब तक चलता 
सिक्का हूँ
दुनिया की 
आँखों में चढ़ा हूँ
जैसा भी हूँ
दुनिया के लिए
मैं चांदी सोना हूँ
सब को मंज़ूर हूँ
जिस दिन थक जाऊंगा
चलना बंद करूंगा
खोटा सिक्का हो जाऊंगा
दुनिया की नज़रों से
गिर जाऊंगा
लाख गुहार करूँ
दूर होता जाऊंगा
फिर नज़रों में नहीं
चढ़ पाऊंगा


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,सफलता असफलता,समय

266-33--21--05-2014

मंगलवार, 20 मई 2014

आत्माओं का मिलन


जुड़ा है
मेरा तुम्हारा हृदय
प्रेम के अभेद्य सेतु से
पढ़ लेता है मेरा मन
तुम्हारे मन को
परस्पर विश्वास से
जान लेता है
मेरा मस्तिष्क
तुम्हारे मस्तिष्क को
सम्बन्धों में
व्याप्त आस्थाओं से
हम अहम से दूर
स्वार्थ से परे हैं
एक दूजे के पूरक हैं
दो होते हुए भी एक हैं
हमारा प्रेम
केवल प्रेम नहीं
आत्माओं का मिलन है
परमात्मा की
असीम कृपा का
स्वादिष्ट मीठा  फल है
मनुष्य बन कर जीने का
परिणाम है 
सम्बन्धों की सार्थक
परिभाषा है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रेम,आत्माओं का मिलन,आस्था,सम्बन्ध,जीवन,जीवन मन्त्र
265-32--20--05-2014


सोमवार, 19 मई 2014

प्रेम का कोई मोल नहीं


प्रेम का 
कोई मोल नहीं
कोई नाप नहीं
कोई  निर्धारित 
तोल नहीं
जब निश्छलता के
कवच में
मन की गहराइयों में
बस जाता है
भावनाओं की
ऊंचाइयों को छू लेता है
अनुभूतियों के
चरमोत्कर्ष पर 
पहुंच जाता है
निर्वाण मार्ग
प्रशस्त हो जाता है
प्रेम पूर्णता प्राप्त 

करता है
कोई अपना
कोई पराया नहीं 

लगता है
सहज सरल मन
हर मनुष्य में
स्व्यं को देखता है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रेम,प्यार,मोहब्बत

264-31--19--05-2014

रविवार, 18 मई 2014

सपनों का गुब्बारा


कभी कभी मन
गुब्बारे सा हो जाता है
आशाओं की हवा से
भर कर
सपनों की दुनिया में
विचरण करने लगता है
हवा के रुख के साथ
इधर उधर भटकता है
सपनों के आकाश को
छूने से पहले ही
व्यथाओं के ताप से
दम घुटने लगता है
आशाओं की सारी हवा
बाहर निकल जाती है
मन का गुब्बारा
जितनी तेज़ी से ऊपर
उठा था
उससे से अधिक तेज़ी से
फुस्स हो कर धड़ाम से
धूल धूसरित हो जाता है
चोट भी खाता है
दर्द भी सहता है
पर एक बार फिर
आशाओं की हवा से
उड़ने लगता है


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सपने,आशाएं,जीवन,

263-30--18--05-2014

लगा लो दांव कितने भी चला लो बाण कितने भी


लगा लो
दांव कितने भी
चला लो
बाण कितने भी
लगा दो
इलज़ाम कितने भी
बिछा दो शूल राहों में 
कर दो
बदनाम शहर में
हम तो
जैसे हैं वैसे ही रहेंगे
ना पहले डरे कभी
ना अब डरेंगे
सच के लिए लड़ते रहे हैं
आगे भी लड़ते रहेंगे
चैन से नहीं बैठेंगे
आइना
दिखाने की आदत है
दिखाते रहेंगे
हार कर भी जीतते रहे हैं
जीतते रहेंगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी,आइना दिखाना,सच्चाई

262-29--18--05-2014

वो खुशियाँ कहाँ से लाऊँ


वो खुशियाँ
कहाँ से लाऊँ
जिन में दर्द न छुपा  हो
वो हँसी कहाँ से लाऊँ
जिस में दर्द का
अहसास न हो
वो दिल कहाँ से लाऊँ
जो कभी जज़्बातों में
झुलसा न हो
वो मन कहाँ से लाऊँ
जिसमें कभी कोई
तूफ़ान  उठा हो
वो चेहरा कहाँ से लाऊँ
जिसमें सिर्फ सुकून
दिखता हो
वो ज़िंदगी कहाँ से लाऊँ
जिसमें कोई गम न हो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
261-28--18--05-2014

ज़िंदगी,शायरी,हँसी,ख़ुशी,गम,दर्द,सुकून