Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शनिवार, 17 मई 2014

गुमाँ था जिनकी वफा पर


गुमाँ था
जिनकी वफा पर
वो ही बेवफा निकले
जान देने की बातें
करते थे जो वो ही
कातिल-ऐ-दिल 
निकले
समझा था रहनुमा जिन्हें
उन्होंने ही कर दिया
घर से बेघर हमें
अब किस पर यकीं
किस पर शक करें
हमें तो हमेशा
सफ़ेद लिबास में
काले दिल मिले
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,नज़्म,वफ़ा,बेवफा, कातिल-ऐ-दिल
260-27--17--05-2014


बात जब ईमान की चली


बात जब
ईमान की चली
खुद को 
पाक साफ़ बताने की
होड़ मच गयी
बात फिर मोहब्बत की
तरफ मुड़ी
यारों की बातें सुन कर
मोहब्बत तक शरमाने लगी
चलते चलते जब
सुकून की याद आयी
हर चेहरे पर उदासी छाई
हर जुबां से
एक बात ही निकली
उम्मीदें तो हमेशा रखी
पर लगता है
नसीब में नहीं है


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
शायरी,उम्मीद,सुकून ,ईमान,शायरी

258-25--17--05-2014

अजीब से अहसासों से गुजरता हूँ


अजीब
अहसासों से 
गुजरता हूँ
जो चाहते हैं
कह नहीं पाते
जिन्हें चाहता हूँ
उन्हें 
कह नहीं पाता हूँ
ना खुश रख पाता हूँ
ना खुश रह पाता हूँ
वो भी गम में 
जीते हैं
मैं भी गम में 
जीता हूँ


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
अहसास,मोहब्बत,चाहत,गम, शायरी

257-24--17--05-2014

मंगलवार, 13 मई 2014

इंसानियत मर कर हवा हो चुकी थी


मुंह से 
बात निकली
कानों ने सुनी 
मन की फितरत ने 
तोड़ मरोड़ कर 
जुबां से कहलवा दी 
बात कुछ और थी 
बन कुछ और गयी 
आगे बढ़ती रही 
दिलों में नफरत की 
आग जलाती रही 
बदलती बदलती 
मज़हब की आग 
बन गयी 
नफरत की हवा 
आंधी में बदल गयी 
दिलों में 
दूरियां बढती रही
प्यार की नगरी 
तहस नहस हो गयी
हँसी 
रुलाई में बदल गयी
इंसानियत मर कर 
हवा हो चुकी थी 
इंसान की लाश 
कहीं जलाई कहीं 
दफनाई जा रही थी 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
इंसानियत,नफरत,फितरत,मज़हब ,
256-23--13--05-2014

ना तो कहने से कुछ बदलता है

ना तो कहने से
कुछ बदलता है
ना चेहरा बदलने से
कुछ बदलता है
ना रोने से 
ना हँसने से 
कुछ बदलता है 
बदलता है तो
केवल करने से
बदलता है
सार्थक सोच
आत्म मंथन से
बदलता है
सब्र रखने से
बदलता है
हिम्मत रखने से
जीवन महकता है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,जीवन मन्त्र, सार्थक सोच ,आत्म मंथन ,सब्र ,हिम्मत
256-23--13--05-2014

रविवार, 11 मई 2014

हास परिहास में


आज
हास परिहास में
किसी का ह्रदय
पीड़ा से भर दिया
भावनाओं को
आहत कर दिया
अब पछता रहा हूँ
कैसे पश्चताप करूँ
सोच कर व्यथित हूँ
खुद से प्रश्न कर रहा हूँ
क्या हक था
मुझे इस नादानी का
अगर मेरे साथ
कोई ऐसा करता
क्या अच्छा लगता
आत्म मंथन के बाद
निष्कर्ष पर पहुंचा हूँ
अब जीवन में
हास परिहास की
सीमाओं को नहीं लाघूँगा
किसी की भावनाओं को
ठेस पहुचाने को
अपराध समझूंगा
संयम को
जीवन आधार बनाऊंगा
आज हुए अपराध की
हाथ जोड़ कर क्षमा
मांगूंगा
आज हास परिहास में
किसी का ह्रदय
पीड़ा से भर दिया
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
हास परिहास,नादानी,जीवन,जीवन मन्त्र

255-22--11--05-2014