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शनिवार, 3 मई 2014

चाँद मायूस था


चाँद मायूस था
========
कल रात जब
चाँद से मिलना हुआ
चाँद मायूस था
मैंने मायूसी की
वज़ह पूछी
चाँद दुखी मन से
कहने लगा
जब चांदनी खुश नहीं
मैं कैसे खुश रह
सकता हूँ
हिम्मत कर के
चाँद से पूछ लिया
क्यों नाराज़ है
चांदनी 
चाँद ने जवाब दिया
चांदनी कहती है
मैं कहलाती 
चांदनी तुम्हारी
हृदय से चाहते हो तो  
क्यों मुझ को
खुद से दूर रखते हो
आसमान में फैलाते हो
समेट कर अपने
पास नहीं रखते हो
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
238-05--03--05-2014
चाँद,चांदनी,मोहब्बत,ख़ुशी,प्रेम


शुक्रवार, 2 मई 2014

संभावनाएं


आग बरसाता सूरज
भूख से त्रस्त गिद्ध
शिकार की खोज में
भटक रहा है
किसी छोटे परिंदे की
जान लेने की
संभावनाएं ढूंढ रहा है
नन्हा परिंदा
गिद्ध से बचने के लिए
खुले आकाश में
घबराया हुआ उड़ रहा है
जान बचाने की
संभावनाएं ढूंढ रहा है
नीचे धरती पर
पतला दुबला
रोग ग्रस्त गरीब
पेट की भूख
मिटाने के लिए
तेज़ धूप में
पत्थर तोड़ रहा है
जीने की नयी
संभावनाएं ढूंढ रहा है
एयर कंडीशंड ऑफिस में
भारी भरकम
शरीर का स्वामी
कई बीमारियों को 
झेल रहा है
फिर भी धन कमाने की
नयी संभावनाएं 
ढूंढ रहा है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
संभावनाएं, जीवन

237-04--02--05-2014

गुरुवार, 1 मई 2014

पहली सीढ़ी पर रहना चाहता हूँ


ज़िंदगी
के पायदान की
पहली सीढ़ी पर
रहना चाहता हूँ
ना कभी
अहम से भरूंगा
ना घमंड में जीऊंगा
फिसल कर गिरूँगा
तो भी अधिक चोट
नहीं खाऊंगा
सीढ़ी पर चढ़ने
उतरनेवाले वाले
हर शख्श से हँस कर
मिलता रहूँगा
चढ़ने वाले को दुआ
उतरनेवाले को
दिलासा देता रहूँगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

अहम,ज़िंदगी,जीवन,जीवन मन्त्र
236-03--02--05-2014

ठिठक जाता हूँ


ठिठक जाता हूँ
=========
कभी कभी
कुछ करने की
सोचता हूँ
ठिठक जाता हूँ
विचार त्याग देता हूँ
किसी से मिलने की
सोचता हूँ
ठिठक जाता हूँ
विचार त्याग देता हूँ
कहीं जाने की
सोचता हूँ
ठिठक जाता हूँ
विचार त्याग देता हूँ
अनिश्चय की स्थिति
चैन नहीं लेने देती
चिंतन मनन के बाद
समझ गया हूँ
ठिठकने से बचना है
तो सोच विचार कर
निर्णय लेना होगा
अनिश्चय को
दृढ निश्चय में
बदलना होगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
235-02--01--05-2014

ठिठकना,अनिश्चय,निश्चय,जीवन,जीवन मन्त्र,निर्णय 

नभ में बादल ठहरे हुए हैं


नभ में 
बादल ठहरे हुए हैं
जल के बोझ तले
दबे हुए हैं
खुल कर बरसना
भी चाहते हैं
नदी नालों में उफान
धरती पर हरयाली
लाना चाहते हैं
पर इंसान की
फितरत से डरते हैं
बरसने के बाद
कौन उन्हें याद करेगा
चिंता में डूबे हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
इंसान,फितरत,ज़िंदगी, चिंता

234-01--01--05-2014

मंगलवार, 29 अप्रैल 2014

जिसे दे ना सकूँ उससे तोहफा कबूल नहीं करता


जिसे दे ना सकूँ
उससे तोहफा
कबूल नहीं करता
जिसे चाहता नहीं 
उससे
दिखावा नहीं करता  
जो पसंद नहीं है
उसे साफ़ कह देता
जो मन को ना भाये
उससे दूर रहता
ज़िंदगी जीना का
यही तरीका मेरा
जिसे समझ आ जाए
दिल उसी से मिलता
जो आइना देख कर
आइना दिखा सकता
उसी से दोस्ती करता  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
दोस्ती,ज़िंदगी,जीवन मन्त्र ,शायरी,

233-76--29--04-2014

हैरान भी होता हूँ,परेशान भी होता हूँ


हैरान भी होता हूँ
परेशान भी होता हूँ
मगर
निराश नहीं होता हूँ
हताशा से दूर रहता हूँ 
अकेले में सोचता हूँ
सब्र से काम लेता हूँ
गलतियों से सीखता हूँ
ईश्वर से दुआ करता हूँ
पीछे नहीं लौटता हूँ
परेशानी से मुक्त होता हूँ
हँसते हुए आगे बढ़ता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
हताशा  सोच,जीवन जीवन मन्त्र,निराशा
232-75--29--04-2014

रविवार, 27 अप्रैल 2014

कौन लिख सकता है उस औरत की कहानी

कौन लिख सकता है
उस औरत की कहानी
गरीबी जिस के लिए
 अभिशाप बन गयी
जिसे जीते जी
कोई इंसान ना मिला
जिसने ना बचपन देखा
ना जवानी देखी
बुढापे में भी नोची गयी
निरंतर दुत्कारी गयी
हवस का
शिकार होती रही
पेट के
खातिर सहती रही
ज़िंदगी भर खुदा से
बदकिस्मती का
कारण पूछती रही
निरंतर
दुआ करती रही
आसूं बहाती रही
बेबस जीती रही
अंत में मर गयी
किसी पुरुष की
कलम में
इतना  हूनर नहीं
इतनी ताकत नहीं
जो एक मज़बूर
औरत के दुखों को
कागज़  पर उतार  सके
संसार को उसकी
सच्चाई बता सके

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
नारी, औरत, मजबूर,स्त्री, हवस, गरीबी

231-74--27--04-2014