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शनिवार, 12 अप्रैल 2014

मन मस्तिष्क ह्रदय का द्वंद्व


मन मस्तिष्क,
ह्रदय का द्वंद्व
जीवन भर निरंतर
चलता रहता,
मन कुछ कहता
मष्तिष्क कुछ,
ह्रदय कुछ और,
क्या होगा? कैसे होगा?
कब होगा?करूँ ?
ना करूँ का प्रश्न
आसानी से
हल नहीं होता
तीनों की अपार इच्छाएं,
आकांक्षाएं आक्षांकाएं
ज्वार भाटे सी 
उठती रहती
क्या उचित?
क्या अनुचित ?
का चक्रव्यूह,मनुष्य को
ना संतुष्ट रहने देता
ना ही जीवन में कभी
चैन लेने देता
जो मन कहता मष्तिष्क
नहीं करने देता,
मष्तिष्क कुछ कहता तो
ह्रदय विरोध करता,
जो ह्रदय चाहता
वो हो नहीं पाता
तीनों के आपसी द्वंद्व में
आत्मा को दिन में कई बार
याद तो किया जाता पर
आत्मा की इच्छानुसार
कोई करता कुछ नहीं
स्वयं क्रंदन करता रहता
कितनी विचित्र स्थिति है
आत्मा की संतुष्टी की
बात करते सब हैं
पर ह्रदय,मन मस्तिष्क में
सामंजस्य नहीं होने से
मनुष्य जीता तो है
पर हर पल खुशी,नाखुशी के
भंवर में फंसा रहता
आत्मा की सुनता नहीं
शान्ति और संतुष्टि की
खोज में भटकता रहता
भूल जाता
आत्मा का संतुष्ट रहना ही
जीवन का सार
सच्चा जीवन आधार है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मन मस्तिष्क ह्रदय, सामंजस्य
जीवन,जीवन मन्त्र
191-33--12--04-2014


शुक्रवार, 11 अप्रैल 2014

जज़्बातों की क़ैद से अब रिहाई ज़रूरी है


जज़्बातों की क़ैद से
अब रिहाई ज़रूरी है
ज़िंदगी बोझ बन जाए
उससे पहले 
राहत ज़रूरी है
दिल की बंद गलियों में
अब रास्ता ज़रूरी है
बेसुकूं मन को
अब सुकून ज़रूरी है
ज़िंदगी जीने के लिए
आँखों में चमक
अब लबों पर 
मुस्कान ज़रूरी है  
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़ज़्बात.सुकून,शायरी

191-33--11--04-2014

दुआ बद्दुआ

किसी की बद्दुआ
कहर बन के आती है
किसी की दुआ
कहर से बचाती है
ये दुआ बद्दुआओं का
खेल बड़ा निराला है
कभी बद्दुआ दुआ पर 
तो कभी दुआ
बद्दुआ पर भारी है
पता ही नहीं चलता
कौन किस पर भारी है
हकीकत तो है
दुआ बद्दुआ खुदा की
कारगुजारी है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
दुआ बद्दुआ

190-32--11--04-2014

गुरुवार, 10 अप्रैल 2014

दिल से कहो ना कहो


दिल से कहो ना कहो
जुबां से ही कह दो
एक बार कंधे पर
हाथ तो रख दो
बस एक बार कह दो
तुम मेरे साथ हो
दर्द कम हो ना हो
लड़ने की हिम्मत
तो आजाएगी
ज़िन्दगी की मुश्किलें
तो कम नहीं होगी
पर उम्मीद तो बंध
ही जायेगी
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी,उम्मीदें ,शायरी

189-31--10--04-2014

एक नया सूरज


हर दिन 
एक नया सूरज
ज़िंदगी में उगता है
मन को 

अपार आशाओं के
उजाले से भरता है
ह्रदय में खुशियों का
संचार होता है
भूलता नहीं हूँ
आशाओं का
संध्याकाल भी आयेगा
खुशियों का
सूर्यास्त भी होगा
निराशा की अंधेरी रात से
सामना भी होगा
पर नए दिन में
नए सूरज के
आगमन के आशाएं
मुझे निराशा के
रेगिस्तान की गर्मी में
झुलसने नहीं देती
कुछ क्षणों के लिए
चेहरे पर
हँसी तो नहीं रहती
पर हँसने की चाहत
मुझे रोने नहीं देती

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़िंदगी,जीवन,जीवन मन्त्र,आशा,निराशा,

188-30--10--04-2014

फुर्सत ही फुर्सत


हर बात के लिए
फुर्सत ही फुर्सत है
फुर्सत नहीं है तो
टूटे रिश्तों को
फिर से
जोड़ने के लिए
खुदा की
इबादत के लिए
ज़िस्म की
बेहतरी के लिए
पडोसी से
मिलने के लिये
बुढ़ापे से झूझते 
लोगों के लिए
बीमार की
देखभाल के लिए
गरीब की 
मदद के लिए
अपाहिज की
सहायता के लिए
निरक्षर को साक्षर
बनाने के लिए
असशक्त को
सशक्त 
बनाने के लिए
फुर्सत नहीं है
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
187-29--10--04-2014
फुर्सत, वक़्त,समय,ज़िंदगी,जीवन


बुधवार, 9 अप्रैल 2014

कुंठाओं का घडा


डरता हूँ कहीं
मन का कुंठाओं भरा
घडा छलक ना जाए
कुंठाएं जग
ज़ाहिर ना हो जाएँ
कई चेहरों पर चढी
नकाब उतर जायेगी
मीठी मुस्कान से
भरी सूरतें
रुआंसी हो जायेगी
कई दोस्तों से दोस्ती
दुश्मनी में बदल जायेगी
नतीजे से घबरा कर
घड़े में पडी दरारों को
सहनशीलता का
मलहम लगाता रहता हूँ
भरसक प्रयास करता हूँ
घडा ना फूटे
ना छलके कभी
जानता हूँ एक दिन
घडा फूटेगा अवश्य
बस किसी तरह
एक एक दिन
आगे बढाता जाता हूँ
कुंठाओं को मन में
समाये रखता हूँ
घुट घुट कर जीता
रहता हूँ 
डा .राजेंद्र तेला ,निरंतर
कुंठा,कुंठाएं,दोस्ती,संयम,सहनशीलता,जीवन जीवन मन्त्र
186-28--09--04-2014


उम्र पर कविता -जो डूब गयी वो किश्ती फिर किनारे नहीं लगती


जो निकल गयी
उस बदली को
याद करने से
बरसात नहीं आती
जो डूब गयी
वो किश्ती फिर
किनारे नहीं लगती
बुढापे में जवानी 
लौट कर नहीं आती
जब तक है
बरकरार जवानी
इसे व्यर्थ ना करो
खूब मेहनत करो 
खूब काम करो 
एक दिन सफलता
कदम चूमेगी
तुम्हें बुलंदी पर
पहुंचाएगी
बुढ़ापे में ज़िंदगी
आराम से कटेगी
नयी पीढी को भी
यही सिखाओगे
आगे बढ़ने का
सही रास्ता दिखाओगे
खुद तो खुशी से
जियोगे ही
दूसरों को सार्थक
मार्गदर्शन का
पुण्य भी कमाओगे
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
185-27--09--04-2014

जवानी ,बुढ़ापा,मार्ग दर्शन,कर्म ,जीवन,जीवन मन्त्र

सम्भावनाओं के अनंत आकाश में


सम्भावनाओं के
अनंत आकाश में
आशा का एक
नन्हा सा तारा भी
टिमटिमाता दिखता 

आभास होने लगता
मानों पूरा आकाश
सितारों से
जगमगाने वाला है ,
इच्छाओं का चाँद
जीवन में उजाला
बरसाने वाला है
 नन्हा तारा अचानक
टूट कर बिखर जाता है
आकाश में दोबारा
अन्धेरा छा जाता है
पर मैं
विचलित नहीं होता
स्व्यं पर
विश्वास रखते हुए
मन में पहले से 
अधिक आशाएं संजोये
आकाश को
निहारना नहीं छोड़ता
कर्म पथ पर चलता
रहता हूँ

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सम्भावनाएं,इच्छाएं,आशाएं,आशा,जीवन,जीवन जीवन मन्त्र
184-26--09--04-2014


मंगलवार, 8 अप्रैल 2014

ना मान मनुहार ना हँसी ठिठोली


ना मान मनुहार
ना हँसी ठिठोली
ना नौक झोंक
ना बातचीत
प्रीत की ये कैसी रीत
निभाई तुमने
बिना महक के
पुष्प सी
प्रेम की दुनिया
बसाई तुमने
मेरे तुम्हारे बीच में
बहम के परदे की
आड़ लगाई तुमने
क्या हो गया
जो नहीं होना था
इशारा तक नहीं
किया तुमने
मौन रह कर
रिश्तों में
आग लगाई तुमने
समय रहते 
पर्दा हटा दो
मन की 
व्यथा मिटा दो
अब तो प्रीत की
रीत निभा दो
कुंठा का
काँटा निकाल दो
मुख से
दो शब्द तो कह दो
प्रेम संसार फिर से
बसा दो

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
प्रीत,रिश्ते,बहम,सम्बन्ध,जीवन,प्रेम

183-25--08--04-2014

ऐसा क्यों होता है


कभी कभी मन में
सोच आता है
ऐसा क्यों होता है
किसी के पास
सब कुछ होते हुए भी
लगता है 

उसके पास कुछ नहीं है
किसी के पास
कुछ नहीं होते हुए भी
लगता है
उसके पास सब कुछ है
कोई कम में भी
संतुष्ट रहता है
कोई सब कुछ होते हुए भी
असंतुष्ट रहता है
एक को खुश रहने का
सूत्र पता है
दूसरा भ्रम में जीता है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
संतुष्ट,असंतुष्ट, जीवन,जीवन मन्त्र

182-24--08--04-2014

When nothing goes right


Some times
When nothing
Goes right
Throughout the day
One feels
Thoroughly disappointed
Irritation sets in
Confidence goes down
One wants to hear
Soothing music
A pep talk
Some good news
Few encouraging
Words
Some consolation
From somebody
Who is close?
To the heart
Understands
The person
More than
Any body
Dr.RajendraTela,Nirantar
Life,irritation,disappointment

181-23--08--04-2014

सोमवार, 7 अप्रैल 2014

अब स्वतंत्र होना चाहता हूँ


अब स्वतंत्र होना
चाहता हूँ
रिश्तों के अरण्य से
माया मोह के समुद्र से
इच्छाओं के जंजाल से
बहते पानी सा बहना
चाहता हूँ
उन्मुक्त जीना चाहता हूँ
जीवन की टेढ़ी मेढ़ी
पगडंडियों से
मुक्त होना चाहता हूँ
शांती को लक्ष्य बना कर
संतुष्टी के पथ पर
चलना चाहता हूँ
निश्छल,निष्कपट,
निष्कलंक
माया मोह से अनभिग्य
आया था संसार में
वैसा ही जाना चाहता हूँ
अब स्वतंत्र होना
 चाहता हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
180-22--07--04-2014
निश्छल,निष्कपट,निष्कलंक, माया मोह,
जीवन,जीवन मन्त्र


जब अहम् अहंकार से भर जाते हो


जब अहम्
अहंकार से भर जाते हो
खुद को
श्रेष्ठ समझने लगते हो
स्वार्थ के
घेरे में फंस जाते हो
जीवन के
पैमाने बदल लेते हो

भ्रम को मित्र बनाते हो
प्रशंसा की
भूख बढ़ा लेते हो
चाटुकारिता चाहते हो
उचित को अनुचित
कहने लगते हो
अपनों से
दूर होते जाते हो
एकांत को
निमंत्रण देते हो

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
179-21--07--04-2014

अहम्,अहंकार,जीवन,जीवन मन्त्र,चाटुकारिता ,स्वार्थ

In day to day life


In day to day life
Though they
May not be right
Most people
Say he is wrong
I am right
Either because of
Ego
Arrogance
Ignorance
Or
Perception
Ego
Leaves no space
For correct thinking
Arrogance
Is inexcusable
Ignorance
Can be forgiven
Perception
Can be given
Benefit of doubt
People
Who admit?
The other is right
Are the ones
More acceptable
Than any person
Who thinks?
He is always right
Dr.RajendraTela,Nirantar
179-21--07--04-2014

Ego,ignorance,perception,arrogance,ego

My karma

The doctors face
Told every thing
The patient’s reports
Had shocked him
Knowing a bomb
Was about to explode
The doctor with
Carefully chosen words
Would now reveal
The disease was serious
But not untreatable
If many died
Many more survived
You need not worry
Pray to god
I shall do my best
Before the doctor spoke
Smilingly
The patient said
Do not worry doctor
I shall pray to god
You try your best
What may come?
Neither shall I cry
Nor blame anybody
I know
Sooner or later
One has to go
If the end is painless
Well and good
It’s god’s wish
If it is painful
My karma would be

The reason 
Dr.Rajendra Tela,Nirantar
178-20--07--04-2014

Karma,deeds,life,doctor,disease

कवी की कलम


कवी की कलम
=========
हँसी खुशी
पीड़ा,वेदना
सोच,विचार
हास्य व्यंग्य
अनुभव ,प्यार
भावनाएं
सम्भावनाएं
जीवन का हर रंग
अनंत शब्दों में
ढल कर
भिन्न रूपों में
कविता
नदी से बहती हैं
जिसने समझा उसे
सार्थक लगती है
मन को लुभाती हैं
अपने साथ बहाती है
जिसने नहीं समझा
उसे निरर्थक
परिश्रम लगती
जीवन की गति
अनुरूप
कवी की कलम
कभी नहीं थमती
कविता
अविरल बहती 
कविता उसकी  
नियति है

डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
177-19--07--04-2014
कवी ,कविता, कलम


प्रतीक्षा के क्षण समझ कर


जब संध्या
झील पर उतरती है
झील प्रसन्न नहीं होती
काली रात के
आगमन की हुँकार
सुनायी पड़ने लगती
मगर विचलित
नहीं होती
धैर्य उत्साह उमंग से
सूर्य रश्मियों के
आभूषण से सजी धजी
संध्या का
आलिंगन करती है
ठिकाने की ओर
उड़ते पंछी
पहाड़ों की छाया
झील को डराने का
प्रयास करती है
झील फिर भी
आक्रान्त नहीं होती
सूर्योदय की प्रतीक्षा के
क्षण समझ कर
रात को सहजता से
अंगीकार करती है 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
176-18--06--04-2014

जीवन,जीवन मन्त्र,विचलित,सहज.धैर्य 

रविवार, 6 अप्रैल 2014

समय की दुहाई


समय की दुहाई
===========
समय की दुहाई
देने से
अच्छा बुरा कहने से
कुछ नहीं होता
समय तो
समय होता है
ना किसी का हुआ
ना किसी का होगा
ना अच्छा होता है
ना बुरा होता है
जिसका जैसा भी
गुजर रहा जीवन
उसका समय वैसा ही
कहलाता रहा है
वैसा ही
कहलाता रहेगा
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
समय,जीवन

175-17--06--04-2014

तुझसे मिला तो नहीं

तुझसे मिला तो नहीं
फिर भी तुझे शुक्रिया
कहना चाहता हूँ
तुझे देख कर दिल में
चाहतों के बीज पड़े थे
जज़बातों ने मोहब्बत का
चेहरा दिखाया दिखाया था
अफ़सोस नहीं गर
मोहब्बत को मुकाम
हांसिल नहीं हो सका
मगर खुशनुमा
अहसासों के साथ
जीने का मकसद मिला
खूबसूरत
ख़्वाबों से रूबरू हुआ
तुझसे मिला तो नहीं
फिर भी तुझे शुक्रिया
कहना चाहता हूँ
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
ज़ज़बात,अहसास,मोहब्बत,चाहत,शुक्रिया,शायरी
174-16--06--04-2014