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रविवार, 12 अक्तूबर 2014

अपना पराया


मुझे रंज है
उससे जिस ने दिया
नाम अपने पराये का
वो अपने भी
अपने कैसे हुए
जो कभी दे ना सके
प्यार अपनों को
वो पराये भी
पराये कैसे हुए
जो देते हैं अपनों से
ज्यादा प्यार हम को
अब तोड़ दो जंजीरें
अपने पराये की
उसे ही अपना मान लो
जो अपना समझ कर
प्यार देता है हम को
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
519-10-12--10-2014

अपना,पराया,प्यार,अपनत्व,जीवन

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