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सोमवार, 20 अक्तूबर 2014

मैं पहल करता हूँ


ना जाने क्यों तुमने
क्रोध को विवेक पर
हावी होने दिया
आसानी से कह दिया
मुझ से कोई रिश्ता
नहीं रखना चाहते
पर कहने से पहले
सोचा नहीं
रिश्ता मेरा ही नहीं
तुम्हारा भी टूटेगा
हृदय मेरा ही नहीं
तुम्हारा भी दुखी होगा
कहने से पहले
दो बार सोच लेते
क्रोध ठंडा होने के बाद
बैठ कर बात कर लेते
महायुद्ध भी संवाद से ही
समाप्त हुए हैं
मेरा तुम्हारा तो
वर्षों का साथ था
बार बार मिलने से
रिश्ता बना था
कैसे एक क्षण में उसे
क्रोध की भेंट चढ़ा दिया
अब भी समय है
तुम नहीं करना चाहो तो
अहंकार छोड़ कर
मैं पहल करता हूँ
संवाद से
मन को भ्रांतियों से
मुक्त कर दें
टूटे रिश्ते को
फिर से जोड़ दें
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

527-18-20--10-2014
क्रोध,विवेक,सम्बन्ध,जीवन,संवाद ,रिश्ता,रिश्ते

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