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रविवार, 12 अक्तूबर 2014

आशा में जीता हूँ


दुखी हूँ
अत्यधिक दुखी हूँ
अब थक गया हूँ
कब तक सहता रहूँ
सोचता रहता
कहता रहता तो
अब तक निराशा में
संसार  से
विदा हो चुका होता
आशा में जीता हूँ
दुःख को जीवन का
एक रूप समझता हूँ
इस कारण हँसते
मुस्काराते जी पाता हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

518-09-12--10-2014
व्यथा,व्यथित,दुःख,जीवन,आशा,निराशा, 

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