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रविवार, 5 अक्तूबर 2014

बिना कांच की खिड़की


ज़िंदगी
बिना कांच की खिड़की
जैसी हो गयी है
जिस में से
ठंडी हवा आती है
तो धूल भरी
आंधी भी आती है
सुबह की नरम धूप
हृदय को
उजाले से भरती है
दोपहर की तेज़ धूप
मन को झुलसा देती है
न ख़ुशी अधिक देर
टिकती है
न निराशा अधिक
देर रहती है
न रुकने वाले 
झूले सी निरंतर
खुद तो झूलती ही है
मुझे भी  झुलाती रहती है
स्थायित्व की कामना
पूरी नहीं होने देती

 © डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
511-03-05--10-2014

आशा,निराशा,ख़ुशी,दुःख,ज़िंदगी,जीवन  

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