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बुधवार, 22 अक्तूबर 2014

तुम अगर हम से ना मिलते

तुम अगर हम से ना मिलते

तुम अगर
हम से ना मिलते
ख्वाब ना दिखाते
ना मंज़िल के
रास्ते बदलते
ना उम्मीदों के
सिलसिले बनते 
सुकून से जी रहे होते
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
529-20-22--10-2014
अफ़साने,मोहब्बत,इल्जाम,तन्हाई,शायरी

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