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शनिवार, 11 अक्तूबर 2014

कुछ तो दुःख समुद्र के भी होंगे


कुछ तो दुःख
समुद्र के भी होंगे
बार बार उफनता है
पानी छलकाता हैं
दुःख में मैंने कुछ
आसूं छलका दिए
तो क्यों इतना
बतंगड़ बनाते हो
समुद्र शक्तिशाली है
उसे कुछ नहीं कहते हो
मुझे कमज़ोर समझ
दबाते हो
क्यों भूल जाते हो
बड़ा हो या छोटा
दुःख तो दुःख होते हैं
सब को कष्ट देते हैं
फिर क्यों अपने दुःख
तुम्हें दूसरों के दुखों से
अधिक लगते हैं
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
513-05-11--10-2014
कमज़ोर,जीवन,अत्याचार,निरंकुशता,

1 टिप्पणी:

  1. दुःख हर किसी को है किसी को ज्यादा किसी को कम कोई इससे अछूता नहीं .. बहुत सुन्दर विषय रचना का !

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