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मंगलवार, 16 सितंबर 2014

पथ से भटका हुआ




न सूरज बूढ़ा होता है
न चाँद बूढ़ा होता है
न हवा थमती हैं
न समंदर
मचलना छोड़ता है
सब वही करते हैं
जो उन्हें करना होता है

मनुष्य निरंतर
पथ से भटकता है
स्व्यं से अधिक
दूसरों पर दृष्टि रखता है
ईर्ष्या द्वेष के
जाल में उलझता है
स्वार्थ में जीता है
थक कर एक दिन
संसार से बेचैन ही
विदा लेता है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
493-33-16--09-2014
ईर्ष्या,द्वेष,स्वार्थ,जीवन,बेचैन

5 टिप्‍पणियां:

  1. सुंदर प्रस्तुति...
    दिनांक 18/09/2014 की नयी पुरानी हलचल पर आप की रचना भी लिंक की गयी है...
    हलचल में आप भी सादर आमंत्रित है...
    हलचल में शामिल की गयी सभी रचनाओं पर अपनी प्रतिकृयाएं दें...
    सादर...
    कुलदीप ठाकुर

    उत्तर देंहटाएं