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गुरुवार, 4 सितंबर 2014

बचपन पर कविता-किसी ने बताया क्यों नहीं था




किसी ने बताया
क्यों नहीं था
बचपन
लौट कर नहीं आता
बचपन का मंज़र
फिर कभी नहीं दिखता
वो बेफिक्री में जीना
वो बेबाक हँसना
झगड़ कर मिलना
मिल कर झगड़ना
ना भावनाओं का सागर
ना कुंठाओं के पर्वत
ना जात पात
ना देश धर्म का झंझट
न कम
ज्यादा का चक्कर
सब का प्यार दुलार
हर आँख का तारा
जब मन आये
खाना खेलना
आँखें थक जाए तो
सो जाना
शायद पता होगा सबको
अगर बता दिया मुझको
बचपन
लौट कर नहीं आता
मैं बच्चा बन कर
जीता रहता
सबसे अलग नज़र आता
उन्हें कोई नहीं पूछता
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
466-06-04--09-2014  
बचपन,बच्चा

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