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सोमवार, 15 सितंबर 2014

हाँ नहीं कहने के सौ बहाने





हाँ नहीं कहने के

सौ बहाने

जैसा चाहो

वैसा बना लो

समय नहीं मिला

तय नहीं कर पाया

सोचना पडेगा

पूछना पडेगा

साफ़ साफ़

क्यों नहीं कह देते हो

हाँ नहीं भर सकते हो

क्यों रिश्तों के

बिगड़ने से डरते हो

अगर हाँ में हाँ

मिलाना ही

रिश्तों को बनाए

रखने का आधार है

तो समझ लो रिश्ता

सच की नहीं

भ्रम की कमज़ोर

नीव पर टिका है

एक दिन तो 

ध्वस्त होना ही है

जितना शीघ्र हो जाए

उतना ही अच्छा है
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
489-29-15--09-2014   
बहाना,बहाने,हाँ,ना, रिश्ता,रिश्ते,selected

2 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सही कहा आपने ... बहुत सुन्दर

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी कविताओं में सरल सहज भाव से गहरी बात कह दी जाती है जो प्रभावित करती है !

    उत्तर देंहटाएं