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शनिवार, 23 अगस्त 2014

आओ अब खुले आकाश के नीचे रहा जाए




बहुत जी लिए

ऐश-ओ-आराम में

आओ अब

खुले आकाश के

नीचे रहा जाए

बेसहारों के दर्द को

समझा जाए

ठंडी हवा के झोंके

गर्म लू के थपेड़ों से

साक्षात्कार किया जाए

बारिश में भीगने

धूल में सनने का

आनंद लिया जाए

कानों में शोर

पल पल डर का

अहसास किया जाए

जीते जी मौत से

मिला जाए

आओ अब गरीब को 

इंसान समझा जाए 


खुले आकाश के

नीचे रहा जाए 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
446-07-22--08-2014
गरीब,इंसान,बेसहारा,दर्द,selected

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