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शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

सवाल जवाब




ना सवाल
बन सके किसी का
ना जवाब
दे सके किसी को
लाचारी में जीते रहे
ना सवाल पूछने का
वक़्त मिला
ना जवाब देने का
ज़िंदगी क्या है
समझने में ही
वक़्त गुजारते रहे
लोगों को
खुद से दूर करते रहे
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
457-18-29--08-2014
सवाल,जवाब, लाचारी,वक़्त, शायरी, selected

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