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शनिवार, 30 अगस्त 2014

मैं बंधन में तुम बंधन में




मैं बंधन में
तुम बंधन में
ना तुम को चैन
ना मुझको चैन
कैसे हृदय 
के
बंधन खोलें
कैसे प्रेम के
प्याले पियें 
कैसे हम तुम 
साथ जियें 
प्रश्न बहुत विकट है
करना बहुत कठिन है
कर्तव्य पथ से
भटक नहीं सकते
मोह का बंधन
तोड़ नहीं सकते
कैसे प्रेम अगन को
शांत करें
कैसे मन को चैन दें
प्रश्न बहुत विकट है
मन में बहुत तड़प है
तुम सपनों में
मुझ को देख लो
मैं सपनों में
तुम को देख लूँ
मन को धैर्य का
पाठ पढ़ा दें
हृदय को भ्रम में डालें
इच्छाओं पर वश करें
प्रश्न बहुत विकट है
करना बहुत कठिन है
ना उपाय मेरे पास
ना उपाय तुम्हारे पास
कैसे भी करें
करना तो पडेगा
कर्तव्य के आगे
सर झुकाना पडेगा
प्रेम अगन में
जलना होगा
यादों के सहारे
प्यासा ही जीना होगा
प्रश्न बहुत विकट है
करना बहुत कठिन है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
459-20-30--08-2014
प्रेम,प्यार,जीवन,बंधन,कर्तव्य

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