ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

शुक्रवार, 29 अगस्त 2014

माफ़ी का मलहम





ह्रदय खोल कर

तुम्हारे दिए घाव

दिखा भी दूं

तुम मीठे शब्दों में

लिपटा हुआ

माफ़ी का मलहम 

लगा कर

ठीक कर भी दो

तो भी उनके निशान

कैसे मिटा पाओगे

मन ने जो दुःख भोगा

उसकी भर पायी

कैसे करोगे

नेत्रों ने जो अश्रु बहाये

वो कैसे लौटाओगे

रातों को जो निद्रा खोयी

उस की पूर्ती कैसे करोगे

पहले ही प्रेम रखते

ईर्ष्या द्वेष से नहीं जीते

आज आत्म ग्लानि से

विचलित नहीं होते

ना अब माफ़ी का 

मलहम लगाने की

आवश्यकता पड़ती

ना मन में पश्चाताप की

अग्नि प्रज्वलित होती
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
458-19-29--08-2014
आत्मग्लानि,पश्चाताप,माफ़ी,क्षमा,जीवन,ईर्ष्या द्वेष,selected

3 टिप्‍पणियां: