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सोमवार, 14 जुलाई 2014

ज़िन्दगी का आइना टूट कर बिखरने लगा है


ज़िन्दगी से
मोह भंग होने लगा है
ज़िन्दगी का आइना
टूट कर बिखरने लगा है 
हर टुकड़े में 
नया चेहरा 
दिखने लगा है
कोई सुन्दर
प्यार से भरा हुआ
कोई बदसूरत
नफरत से भरा हुआ
कोई हँसता हुआ
कोई रोता हुआ
कोई बेफिक्र जी रहा
कोई चिंता में
घुला जा रहा है
बेचैनी का भाव लिए
चैन की तलाश में
भटक रहा है
मगर फिर भी
इच्छाओं के समुद्र में
गोते लगा रहा है
सब देख कर समझ
आने लगा है
क्यों ज़िन्दगी का 

आइना 
टूट कर बिखरने लगा है
संतुष्ट रहे 
बिना 
आइना साबुत
कैसे रह सकता है

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

434-45-14--07-2014
ज़िंदगी,आइना,इच्छाएं,संतुष्टि,चैन,बेचैनी,

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