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शुक्रवार, 4 जुलाई 2014

वृक्ष पर कविता-कहने को तो काँटों भरा बबूल हूँ


कहने को तो
काँटों भरा बबूल हूँ
कर्मों में
फूलों से अधिक महकता हूँ
मरुधर को हरयाली
राह चलते को छाँव देता हूँ
मनुष्य को गोंद
भेड़ बकरियों को भोजन
पक्षियों को विश्राम देता हूँ
न मरुधरा की
गर्म लू से घबराता हूँ
न सूर्य के 
ताप से डरता हूँ
सूख भी जाऊं तो
जलाने के काम आता हूँ
कहने को तो
काँटों भरा बबूल हूँ

© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
402-13-04--07-2014
बबूल,कांटे,वृक्ष,प्रकृति,कर्म


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