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सोमवार, 14 जुलाई 2014

वृद्धावस्था पर कविता --उम्र के जिस मोड़ पर खडा हूँ

थकान बढ़ने लगी
चेहरे पर उम्र दिखने लगी
कब पुत्र से 
पिता फिर दादा बना
पता ही नहीं चला
कुछ पल आये जीवन में
जब रास्ता दुर्गम लगा
सब्र संयम से पार किया
उम्र के 
जिस मोड़ पर खडा हूँ
प्रश्न मुंह खोले सामने खडा है
कह रहा है
अब ताकत कम हो गयी
उम्र बढ़ गयी
कठनाइयों से कैसे लड़ोगे
अवाक रह जाता हूँ
घबराने लगता हूँ
कुछ पल सोचता हूँ
अपने 
आप से ही कहता हूँ
जीवन वृक्ष के
पत्ते पीले अवश्य हो गए
पर गिरे नहीं
जब तक पेड़ में जान है
पहले जैसे ही लहराते रहेंगे
हवा के 
तेज़ झोंके सहते रहेंगे
आसानी से गिरेंगे नहीं
हिम्मत से लड़ते रहेंगे
सब्र से जीते रहेंगे 
© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर

433-44-14--07-2014

उम्र,जीवन,बुढ़ापा,वृद्धावस्था   

4 टिप्‍पणियां:

  1. उम्र कोई भी हो...जीवन के हर दौर में संघर्ष है...और यही संघर्ष जीवन है !! सुन्दर !!

    उत्तर देंहटाएं
  2. रास्ता स्वयं चलना है आगे का उद्देश्य निश्चित कर , इसलिए इस मोड़ पर अपने स्वयं में दृढ़ता जगानी बहुत ज़रूरी है - न दैन्यं न पलायनं !

    उत्तर देंहटाएं
  3. ​ सच है की बुढ़ापे में शरीर कमजोर हो जाता है , संघर्ष और भी ज्यादा हो जाता है लेकिन संघर्ष हर उम्र , हर वक्त है ! बढ़िया शब्द

    उत्तर देंहटाएं
  4. राजेन्द्र महाजन9 सितंबर 2014 को 5:17 pm

    प्रचंड प्रखर सूरज को भी
    शाम हुई तो ढलना है
    लम्बा है सफर, है कठिन डगर
    पर पथिक तुझे तो चलना है

    उत्तर देंहटाएं