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मंगलवार, 24 जून 2014

रखना था कलम का ध्यान स्याही के रंग में उलझ गए


 रखना था
कलम का ध्यान
स्याही के
रंग में उलझ गए
एक शब्द भी
ना लिख पाये
चलना था
कर्म के पथ पर
लक्ष्य की
चिंता में अटक गए
देखनी थी
व्यक्ति की खूबियां
बुराइयां ढूंढने में
व्यस्त हो गए
एक कदम भी
आगे ना बढ़ सके
दो कदम
पीछे चले गए
अर्थहीन
सोच के कारण

जीवन व्यर्थ कर बैठे
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
374-70-24--06-2014

Selected,कर्म,लक्ष्य,सोच,जीवन,जीवन मन्त्र 

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