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सोमवार, 16 जून 2014

ये मुल्क न मेरा है न तेरा है


ये मुल्क न मेरा है
न तेरा है
हर शज़र हर गुल
हर नदी हर पहाड़
ये धरती ये आसमां
रामायण गीता
ग़ालिब की शायरी
कबीर के दोहे
यहाँ रहने वाले
हर बाशिंदे के हैं
न साथ लाये थे कुछ
न साथ ले जाओगे
यहां का यही पर
छोड़ जाओगे
फिर क्यों ये
तेरे मेरे का झगड़ा है
ये मुल्क न मेरा है
न तेरा है
यहाँ रहने वाले
हर बाशिंदे का हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
मुल्क,देश,तेरा,मेरा,

343-41-16--06-2014

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