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रविवार, 29 जून 2014

पक्षी पर कविता- जल से गगन तक बसते हैं हम


धरा के एक छोर से
दूसरे छोर तक
जल से गगन तक
बसते हैं हम
छोटे तो इतने छोटे
हथेली में समा जाएँ
बड़े तो इतने बड़े
विशाल पंखों से
मनुष्य को
ढक सकते हैं हम
ना देश ना परदेस
सारे संसार को
अपना समझते हैं हम 
ना वस्त्राभूषण
ना पक्का घर
ना कोई रक्षक
भक्षक से बचकर
वनस्पति की
छाया में जीते हैं हम
ना शीत से घबराते
ना गर्मी से ड़रते हैं हम
रंग बिरंगे
सुन्दर सलोने
सुरीली आवाज़ से
लुभाते हैं हम

गगन में उड़ना हो
धरती पर चलना हो
जल में तैरना हो
हर विधा में निपुण हैं हम
हम पंछी जगत के
धरा से गगन तक
जल से पर्वत तक
बसते हैं हम

कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
पक्षी,पक्षियों,पंछी,पक्षियों पर कविता,पक्षी पर कविता

385-81-29--06-2014

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