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गुरुवार, 5 जून 2014

उसकी यादें


दरख्तों के साए भी
सूरज के उजाले के साथ
सुबह-ओ-शाम
छोटे बड़े होते रहते
पर उसकी यादें
ना बढ़ती ना कम होती
वैसे ही रुलाती रहती
सुबह होते ही
उसे भूलने की
उम्मीदें तो बढ़ती
मगर रात आते आते
उम्मीदें ख़त्म हो जाती
बेचैनी बढ़ती जाती  
अब रात भी रोज़ जैसे ही
नम आँखों में बीतेगी
ख्याल भर से ही मन की
घबराहट भी बढ़ जाती
ये जानते हुए भी वो
अब दुनिया में नहीं है
यादें कम होने का
नाम ही नहीं लेती
उसकी यादें
कभी दोस्त होती थी
उसके जाने के बाद वो भी
अब दुश्मन बन गयी हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
दरख़्त,साये,याद,यादें,मोहब्बत,शायरी
315-12--05--06-2014


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