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सोमवार, 30 जून 2014

मृत्यु पर कविता - नदी जब सूखने लगती है


नदी जब सूखने लगती है
किनारे टूटने लगते हैं
मिटटी तड़कने लगती है
जीव तड़पने लगते हैं 
कोई प्रिय जब 
जीवन से झूझ रहा हो
शय्या पर लाचार पड़ा हो
हृदय में दुःख की 
अग्नि धधकती है
मन में असहनीय 
दर्द की अनुभूति होती है
आत्मा अशांत हो जाती है
आँखों की नमी कम
होने का नाम नहीं लेती  
मृत्यु दरवाज़े पर
 खड़ी प्रतीत होती है
कॉपीराइट@
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
जीवन,लाचार,मृत्यु,झूझना,हृदय,पीड़ा,दर्द
386-82-30--06-2014

1 टिप्पणी:

  1. शाश्वत यथार्थ का सटीक शब्द चित्र खींचा है ! मर्मस्पर्शी रचना !

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