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शुक्रवार, 9 मई 2014

आस तो अपनों से भी थी


आस 
अपनों से भी थी
आस 
परायों से भी थी
अगर आस
पूरी नहीं हुयी
कैसे किसी को
गुनाहगार बताऊँ
शायद मैं ही
किसी की आस पर
खरा नहीं उतरा
फिर कैसे किसी से
उम्मीद करूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
252-19--09--05-2014

आस,आशा,उम्मीद,जीवन

1 टिप्पणी:

  1. wah.sach ko sweekarti rachnaa jise kahne ka sahas koi koi karta hain .............. kabhi hamare blog par bhi aaye

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