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मंगलवार, 13 मई 2014

इंसानियत मर कर हवा हो चुकी थी


मुंह से 
बात निकली
कानों ने सुनी 
मन की फितरत ने 
तोड़ मरोड़ कर 
जुबां से कहलवा दी 
बात कुछ और थी 
बन कुछ और गयी 
आगे बढ़ती रही 
दिलों में नफरत की 
आग जलाती रही 
बदलती बदलती 
मज़हब की आग 
बन गयी 
नफरत की हवा 
आंधी में बदल गयी 
दिलों में 
दूरियां बढती रही
प्यार की नगरी 
तहस नहस हो गयी
हँसी 
रुलाई में बदल गयी
इंसानियत मर कर 
हवा हो चुकी थी 
इंसान की लाश 
कहीं जलाई कहीं 
दफनाई जा रही थी 
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
इंसानियत,नफरत,फितरत,मज़हब ,
256-23--13--05-2014

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