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रविवार, 25 मई 2014

जब शिखर पर था


जब शिखर पर था
ताज़े अखबार सा था
हर कोई पढ़ने के लिए
झपटता था
क्या कह रहा हूँ
क्या कर रहा हूँ
क्या खाता हूँ
क्या सोचता हूँ
ध्यान से देखता था
कान लगा कर सुनता था
मित्रों में चर्चा करता था
शहर में चर्चा का
विषय था
तारीख बदलती गए
उम्र के साथ
शिखर से नीचे आ गया
ताज़ा अखबार भी
रद्दी हो गया
कभी कहीं बिछाना हो
कुछ बाँधना हो
कुछ पौछना हो
जैसे भी
जब भी ज़रुरत पड़े
काम में लिया जाता है
अखबार जैसे ही
मैं भी पुराना हो गया हूँ
आवश्यकतानुसार
लोग मिलने आते हैं
सुनते सुनाते हैं
पर मुझे न कोई दुःख है
ना ही निराशा
शिखर पर बैठे
हर व्यक्ति को
ऐसे दिन देखने पड़ते हैं
एक बात की संतुष्टि है
लोग अब भी कभी कभी
मेरे शिखर के
समय की बात करते हैं
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
277-44--25--05-2014

जीवन,बुढ़ापा,उम्र,अखबार ,संतुष्टि

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