ADVERTISEMENT

Bookmark and Share

Register To Recieve Latest Poems On Your Email or Mobile

Enter your email address:

Click Here To Subscribe On Mobile Bookmark and Share

मंगलवार, 6 मई 2014

बचपन से बुढापे तक


जब भी शहर के
पुराने पुल से गुजरता हूँ
लगता है
बचपन से बुढापे तक की
यात्रा कर रहा हूँ
पुल की जगह जगह से
टूटी रेलिंग
पैबंद लगी सड़क में
मुझे मेरा आज दिखने
लगता है
चेहरे पर बुढापे का दर्द
झलकने लगता है
दीवारों पर लगे
नयी पुरानी फिल्मों के
रंग बिरंगे पोस्टर
मुझे मेरे बचपन की
याद दिलाते हैं
मन में जिज्ञासा जगाते हैं
रात को चमकती हुयी
मरकरी लाइटें
मुझे अपनी जवानी के
मस्त दिनों में लौटाती हैं
मुझे किसी मशहूर गीत की
पंक्तियाँ गुनगाने को
मजबूर करती हैं
जब भी शहर के
पुराने पुल से गुजरता हूँ
लगता है
बचपन से बुढापे तक की
यात्रा कर रहा हूँ
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
बचपन,बुढ़ापा,जीवन

244-11--06--05-2014

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें