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रविवार, 4 मई 2014

उथला सोच

मनुष्य का
सोच ही नहीं
नदी समुद्र,सागर 
सब उथले हो गए
गंदे नाले और गंगा में
भेद समाप्त हो गया
पहाड़ों की ऊंचाई तो
कम नहीं हुई पर 
पर्यावरण पर 
निरंतर अत्याचार से
वातावरण की
स्वच्छता कम हो गयी
आकाश का विस्तार तो
कम नहीं हुआ
पर अतिक्रमण से त्रस्त
पक्षियों के लिए
असुरक्षित हो गया
मनुष्य के
उथले सोच से 
धरती जल नभ
सब उथले हो गए
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
पर्यावरण,प्रकृति,जल,नभ,थल,
240-07--05--05-201

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