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शुक्रवार, 30 मई 2014

कितना सुन्दर द्रश्य था


कितना
सुन्दर द्रश्य था
जब नभ की
थाह लेने के लिए
 चिड़िया ने पहली बार
पंख फैलाए थे
ह्रदय उल्लास से
उछलने लगा था
कितना सुन्दर द्रश्य था
जब जीवन यात्रा पर
चलने के लिए
नन्हे बालक ने पहली बार
कदम बढाए थे
मन आशाओं से भर गया था
कितना सुन्दर द्रश्य था
जब नन्ही कली ने
बगिया को महकाने के लिए
अपने चक्षु खोले थे 
ह्रदय में भावनाओं का
सागर उमड़ा था
कितना सुन्दर द्रश्य था
जब विशाल वृक्ष
बनने की राह में
नन्हा बीज 
पल्लवित हुआ था
मन विश्वास से 
भर गया था
डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
295-62--30--05-2014
उल्लास,सुन्दर दृश्य ,भावनाएं,जीवन,ख़ुशी,संवेदना


1 टिप्पणी:

  1. आपकी लिखी रचना शनिवार 31 मई 2014 को लिंक की जाएगी...............
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.in आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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