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रविवार, 18 मई 2014

सपनों का गुब्बारा


कभी कभी मन
गुब्बारे सा हो जाता है
आशाओं की हवा से
भर कर
सपनों की दुनिया में
विचरण करने लगता है
हवा के रुख के साथ
इधर उधर भटकता है
सपनों के आकाश को
छूने से पहले ही
व्यथाओं के ताप से
दम घुटने लगता है
आशाओं की सारी हवा
बाहर निकल जाती है
मन का गुब्बारा
जितनी तेज़ी से ऊपर
उठा था
उससे से अधिक तेज़ी से
फुस्स हो कर धड़ाम से
धूल धूसरित हो जाता है
चोट भी खाता है
दर्द भी सहता है
पर एक बार फिर
आशाओं की हवा से
उड़ने लगता है


© डा.राजेंद्र तेला,निरंतर
सपने,आशाएं,जीवन,

263-30--18--05-2014

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